Wednesday, January 28, 2015

माशाअल्लाह घर वापसी

अब जर्मनी का फुटबाल खिलाड़ी, मुसलमान हुआ

युरोप में इस्लाम के खिलाफ जारी कुप्रचारों के मध्य जर्मनी के फुटबाल खिलाड़ी, डेनी ब्लूम ने मुसलमान होने का एलान किया

जर्मनी के नूरेनबर्ग क्लब के खिलाड़ी डेनी ब्लूम ने यह घोषणा बेल्ड नामक एक जर्मन पत्रिका से बातचीत में की।

उन्होंने बताया कि उन्होंने यह फैसला, कुछ दिनों पहले एक मस्जिद में जाने के बाद लिया।
ब्लूम ने बताया कि आरंभ में मुझे अपने इस फैसले से बहुत डर लगा लेकिन फिर हिम्मत जुटा पर मैंने अपने पिता को, मुसलमान होने की बात बता दी।
ब्लूम का कहना है कि मुझे महसूस हुआ कि इस्लाम मुझे शक्ति प्रदान कर रहा है और मुसलमान होने के मेरे मन में आशा बढ़ी है जबकि नमाज़ पढ़ने से मेरे मन को शांति मिलती है।
उन्होंने बताया कि कुछ दिनों पूर्व जब मैं एक मस्जिद में गया तो मेरा दिल बड़ी तेज़ी से धड़कने लगा और मुझे इस्लाम के बारे में अधिक जानने की जिज्ञासा हुई।
याद रहे पश्चिम में इस्लाम के विरोध के बाद, मुसलमान होने की प्रक्रिया में तेज़ी आयी है।
पश्चिमी संचार माध्यमों में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के आपत्तिजनक कैरिकेचरों के प्रकाशन के बाद यूरोप में इस्लाम की लोकप्रियता में अधिक वृद्धि हो गई है और बड़ी संख्या में यहूदी और ईसाई, इस्लाम स्वीकार कर रहे हैं।

Sunday, October 12, 2014

Ragistaan kaise bante h

जियोलोजी यानि भूगर्भ विज्ञान की मदद से हम मालूम करते हैं कि ज़मीन के जो अलग अलग हिस्से अलग अलग शक्ल में मौजूद हैं वह उस शक्ल में क्यों हैं। मसलन कहीं पर ऊंचे ऊंचे पहाड़ हैं, कहीं पर समुन्द्र तो कहीं फैला हुआ रेगिस्तान जहाँ रेत के टीलों के सिवा और कुछ नहीं। इंसान हमेशा से ही इस जुस्तजू में रहा है कि पहाड़ कैसे बने, या ज़मीन के कुछ हिस्से पूरी तरह खुश्क क्यों हैं। ज़मीन के बारे में जियोलाजिकल सर्वेज में कुछ बातें ऐसी निकल कर आती हैं जो काफी इण्टरेस्टिंग होती हैं। मिसाल के तौर पर पहाड़ों के बारे में यह अंदाज़ा लगाया गया है कि ज़मीन के भीतरी हिस्से में मौजूद प्लेटें जब एक दूसरे की तरफ खिसकीं तो उनके टकराने की वजह से पहाड़ों का निर्माण हुआ। 


अब बात करते हैं रेगिस्तान की। हम जानते हैं कि हमारी ज़मीन पर रेत के ऐसे विशाल मैदान मौजूद हैं जहाँ न कोई आदमज़ात रहती है और न कोई दरख्त उगता है। अफ्रीका का सहारा व कालाहारी, एशिया का गोबी, आस्ट्रेलिया का ग्रेट विक्टोरियन डेज़र्ट और चिली का आटाकामा इसी तरह के इलाके हैं। अब सवाल उठता है कि रेगिस्तान कैसे बने? और यह कितने पुराने हैं? इस बारे में भूगर्भ विज्ञान के अनुसार जहाँ कुछ रेगिस्तान लाखों साल पहले से मौजूद हैं वहीं कुछ की उम्र 8000-10000 साल से ज्यादा पुरानी नहीं है।

ज्यादातर रेगिस्तान इक्वेटर के पास दोनों तरफ 25 डिग्री की बेल्ट में मिलते हैं। इस क्षेत्र का ऊंचा वायुमंडलीय दाब ज्यादा ऊंचाई पर मौजूद ठंडी खुश्क हवा को ज़मीन तक लाता है। इस दौरान सूरज की सीधी किरणें इस हवा को तेज़ गर्म करती हैं नतीजे में वहाँ की ज़मीन निहायत खुश्क और गर्म हो जाती है। अफ्रीका के सहारा व कालाहारी इसी तरह के रेगिस्तान हैं। रेगिस्तान के बनने की एक और वजह उसके किनारों पर ऊंचे पहाड़ों का होना है। जिसकी वजह से समुन्द्र से आने वाली नम हवा रुक जाती है और बादल पहाड़ों के एक ही तरफ बरस कर रुक जाते हैं। नतीजे में दूसरी तरफ खुश्की का मैदान बाकी रह जाता है। चीन का गोबी रेगिस्तान जो हिमालय के दूसरी तरफ है, इसी तरह का रेगिस्तान है। 

रेगिस्तान के बारे में एक सवाल ये है कि सहारा जैसे कुछ रेगिस्तानों में रेत के पहाड़ क्यों पाये जाते हैं और हज़ारों साल पहले जब वहाँ रेगिस्तान नहीं था तो वहाँ की ज़मीन कैसी थी? साइंस इस बारे में ज्यादा नहीं बताती। लेकिन हमारी पुरानी किताबें इस पर खामोश नहीं हैं। शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब एललुश्शराये में मौजूद इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम का कौल इस बारे में काफी कुछ रोशनी डालता है। 


हज़रत इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम ने नजफ का नाम नजफ पड़ने का सबब बताते हुए फरमाया कि नजफ पहले एक पहाड़ था। और ये वही पहाड़ था जिसके लिये हज़रत नूह के बेटे ने कहा था कि मैं पहाड़ पर चढ़ जाऊंगा वह मुझे पानी में डूबने से बचा लेगा और इस ज़मीन पर उससे बड़ा कोई पहाड़ न था। अल्लाह ने पहाड़ की तरफ वही की कि ऐ पहाड़ क्या तेरे ज़रिये ये मेरे अज़ाब से बचेगा? ये सुन कर पहाड़ रेज़ा रेज़ा होकर करबला व शाम की तरफ रेत बनकर फैल गया। उसके बाद वह एक बड़ा समुन्द्र बन गया और उसका नाम बहरनी (यानि चरबी का समुन्द्र) पड़ गया। उसके बाद वह जफ यानि खुश्क हो गया और वह नीजफ कहा जाने लगा और फिर उसे लोग नीजफ कहने लगे और कुछ दिनों बाद नजफ कहलाने लगा।

इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम के जुमलों से यह साफ हो जाता है कि नजफ और उस जैसे दूसरे रेगिस्तान जहाँ मौजूद हैं वहाँ पहले ऊंचे पहाड़ मौजूद थे। फिर मौसम ने करवट ली और वह इलाके पानी से भर गये इस पानी ने पहाड़ों को रेत की शक्ल में बिखेर दिया और फिर सूरज से आने वाली तेज़ गर्म किरणों ने पानी को भाप बनाकर उड़ा दिया, नतीजे में वहाँ बाकी रह गयी बिखरी हुई रेत जो खुश्क हवा के ज़ोर में कभी समतल हो जाती है तो कभी ऊंचे टीलों की शक्ल में आ जाती है। ये ठीक उसी तरह हुआ जैसे पहाड़ों से आने वाली बहती हुई नदियों के किनारे दूर दूर तक रेत पैदा हो जाती है। ये रेत वास्तव में उन पहाड़ों के रेज़े होते हैं जिनसे गुज़रकर वह नदी बहती है। यही असली वजह है रेगिस्तान में रेत के टीलों का मौजूदगी की। 

ये डिस्कवरी जिसकी हकीकत तक अभी साइंस नहीं पहुंच पायी है, हमारी बारह सौ साल पुरानी किताबों में मौजूद है। और यकीनन हमें इसपर हैरत नहीं होनी चाहिए क्योंकि हमारे इमामों के इल्म से आगे दुनिया की कोई साइंस नहीं। 

Suraj grahan ka nazaria

विचार करते हैं शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब एललुश्शराये में दर्ज सूरज ग्रहण से मुताल्लिक चंद बातों पर जो रसूल (स.) की हदीसों से ली गयी हैं।

‘---और अगर कहा जाये कि सूरज ग्रहण के लिये नमाज़ क्यों करार दी गयी तो कहा जायेगा कि ये अल्लाह की निशानियों में से एक निशानी है और कोई नहीं जानता कि ये सूरज ग्रहण रहमत के लिये हुआ है या अज़ाब के लिये। इसलिए नबी (स.) ने चाहा कि आप की उम्मत अपने खालिक व रहमान की बारगाह में गिड़गिड़ाकर दुआ करे कि वह इस गहन के बुरे असरात से बचाये जिस तरह हज़रत यूनुस (अ.) की कौम को कि जब उस ने अपने खालिक से गिड़गिड़ाकर दुआ माँगी तो अल्लाह ने उनसे अज़ाब को टाल दिया।

-----------------और अगर कहा जाये कि रुकूअ के बदले सज्दे क्यों करार पाये तो कहा जायेगा कि खड़े होकर नमाज़ पढ़ना अफज़ल है बैठकर नमाज़ पढ़ने से लेकिन खड़ा शख्स ग्रहण लगने और उसके छूटने को देख सकता है और जो सज्दे में है वह नहीं देख सकता।’’

देखा जाये तो उपरोक्त पैरा को पढ़ने पर तीन बातें निकलकर सामने आती हैं।

1- सूरज ग्रहण अल्लाह की निशानी है।

2- सूरज ग्रहण या तो रहमत के लिये होता है या अज़ाब के लिये, यानि या तो इससे फायदा होता है या फिर नुकसान।

3- सूरज ग्रहण को देखना नहीं चाहिए।

अब देखते हैं मौजूदा साइंस के नज़रिये से ये बातें किस हद तक सही हैं। सबसे पहले बात करते हैं प्वाइंट नं 3 पर। जब ये बात इस्लाम ने बताई कि सूरज ग्रहण को देखना नुकसानदायक हो सकता है तो मुसलमानों ने तो ये बात बिना हिचक मान ली लेकिन यूरोपियन साइंटिस्ट इसे एक अर्से तक अंधविश्वास मानते रहे। लेकिन जब सूरज ग्रहण को नंगी आँखों से देखने वाले अंधे होना शुरू हो गये तो साइंसदाँ इसपर कुछ सोचने के लिये मजबूर हुए। फिर आगे रिसर्च में ये साबित हुआ कि सूर्य ग्रहण के वक्त सूर्य से जो अदृश्य रेडियेशन निकलता है वह आँखों के रेटिना को हमेशा के लिये खराब कर देता है। चूंकि सूर्य ग्रहण के वक्त सूर्य की चमक बहुत कम हो जाती है और लोग सोचते हैं कि उसे देखने से आँखों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। लेकिन ये हकीकत है कि सूरज से खतरनाक रेडियेशन हमेशा ही निकलता रहता है और कभी भी उसे सीधे देखना हानिकारक होता है। यहाँ तक कि उसे बाइनाकुलर या कैमरे से भी देखना नुकसानदेय होता है।

अब बात करते हैं प्वाइंट नं 2 पर। इस्लाम के अनुसार सूरज ग्रहण अल्लाह की रहमत भी होता है और अज़ाब भी। दूसरे लफ्ज़ों में सूरज ग्रहण फायदा भी पहुंचा सकता है और नुकसान भी। सूरज ग्रहण के फायदों के बारे में साइंस अभी लगभग अँधेरे में है। और इसपर बड़ी रिसर्च की ज़रूरत है। लेकिन जो सामने की बात दिखाई देती है वह ये कि सूरज और दूसरे ग्रहों की बनावट समझने में सूरज ग्रहण का बहुत बड़ा योगदान होता है। पुराने ज़माने में ग्रीक व रोम के लोग इसके ज़रिये अपने कैलेण्डर सही करते थे। सूरज व चाँद की सही परिधि व व्यास इसी दौरान नापा गया। इस दौरान एस्ट्रोनोमी की स्टडी में बहुत सी ऐसी बातों का पता चलता है जिनका अध्ययन चमकते सूरज के वक्त नामुमकिन होता है। 

अगर इसे प्वाइंट नं 1 के साथ मिलाकर देखा जाये कि सूरज ग्रहण अल्लाह की निशानियों में से एक निशानी है तो मामला साफ हो जाता है। यानि सूरज ग्रहण के दौरान कुदरत के ऐसे करिश्मे नज़र आते हैं जिनकी झलक आम दिनों में दिखनी तकरीबन नामुमकिन है। उन्नीसवीं सदी में जानसेन ने एक सूरज ग्रहण को स्पेक्ट्रोस्कोप से देखने पर ऐसे तत्व का पता चलाया जो पृथ्वी पर नहीं पाया जाता था। उसके तीस साल बाद यह तत्व पृथ्वी पर भी ढूंढ लिया गया। यह तत्व था हीलियम जो हाईड्रोजन के बाद सबसे हलका तत्व होता है। 

आइंस्टीन ने अपनी जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी में जब बताया कि रौशनी की किरण का पथ गुरुत्वीय प्रभाव में बदल जाता है और स्पेस-टाइम कर्व होता है, तो इसको प्रायोगिक रूप में सूरज ग्रहण के समय देखा गया। ऐसे ही समय में चन्द्रमा और पृथ्वी की गति की सही सही गणना लेसर की मदद से की गयी। चाँद ग्रहण के दौरान ही यह मालूम किया गया कि धरती पर ओजोन की परत 50 से 80 किमी0 मोटाई की है। सूरज ग्रहण के दौरान मालूम हुआ कि वहाँ पर आयरन बहुत ऊंची आयनीकृत अवस्था में मौजूद है। इस अवस्था से सूरज के कोरोना के ताप का अंदाज़ा दस लाख डिग्री सेंटीग्रेड लगाया गया है।

इस तरह जहाँ सूरज ग्रहण, इसको सीधे देखने वालों को अंधा कर देता है और जिंदगी भर का अज़ाब बन जाता है वहीं ये अक्ल वालों के लिये और रिसर्च करने वालों के लिये रहमत बनकर आता है क्यांकि इनके ज़रिये से नयी नयी बातों का पता चलता है और हम अल्लाह की कुदरत से रोशनास होते हैं।

हम देखते हैं कि आज साइंस जो भी डिस्कवर कर रही है उसकी दिशा दिखा रही हैं हज़ार साल से ज्यादा पुरानी हमारी हदीसें।         

Thursday, October 2, 2014

Quran abd science

हकीम दानिश चुममी वाले

समुद्र-विज्ञान और भू-विज्ञान के जाने माने विशेषज्ञ प्रोफेसर दुर्गा रावजद्दा स्थित शाह अब्दुल अजी़ज़ यूनिवर्सिटी, सऊदी अरब में प्रोफ़ेसर रह चुके हैं।
एक बार उन्हें निम्नलिखित पवित्र कुरान की आयत(श्लोक) की समीक्षा के लिये कहा गया जिसमे अल्लाह फरमाता है -
♥ “या फिर उसका उदाहरण ऐसा है जैसे एक गहरे समुद्र में अंधेरे के ऊपर एक मौज छाई हुई है, उसके ऊपर एक और मौज और उसके ऊपर बादल अंधकार पर अंधकार छाया हुआ है, आदमी अपना हाथ निकाले तो उसे भी न देखने पाए। अल्लाह जिसे नूर न बख्शे उसके लिये फिर कोई नूर नहीं।” - (अल-क़ुरआन: सूर 24. आयत.40 )

प्रोफे़सर राव ने कहा – वैज्ञानिक अभी हाल में ही आधुनिक यंत्रों की सहायता से यह पुष्टि करने के योग्य हुए हैं कि समुद्र की गहराईयों में अंधकार होता है। यह मनुष्य के बस से बाहर है कि वह 20 या 30 मीटर से ज़्यादा गहराई में अतिरिक्त यंत्र्रों और समानों से लैस हुए बिना डुबकी लगा सके इसके अतिरिक्त, मानव शरीर में इतनी सहन शक्ति नहीं है कि जो 200 मीटर से अधिक गहराई में पडने वाले पानी के दबाव का सामना करते हुए जीवित भी रह सके। यह पवित्र आयत तमाम समुद्रों की तरफ़ इशारा नहीं करती क्योंकि हर समुद्र को परत दर परत अंधकार, का साझीदार करार नहीं दिया जा सकता अलबत्ता यह पवित्र आयत विशेष रूप से गहरे समुद्रों की ओर आकर्षित करती है! क्योंकि पवित्र क़ुरआन की इस आयत में भी “विशाल और गहरे समुद्र के अंधकार” का उदाहरण दिया गया है गहरे समुद्र का यह तह दर तह अंधकार दो कारणों का परिणाम है।

•प्रथम: आम रौशनी की एक किरण सात रंगों से मिल कर बनती है। यह सात रंग क्रमशः बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल (vibgyor) है। रौशनी की किरणें जब जल में प्रवेश करती हैं तो प्रतिछायांकन की क्रिया से गुज़रती हैं ऊपर से नीचे की तरफ़ 10 से 15 मीटर के बीच जल में लाल रंग आत्मसात हो जाता है। इस लिये अगर कोई गो़ताखोर पानी में पच्चीस मीटर की गहराई तक जा पहुंचे और ज़ख़्मी हो जाए तो वह अपने खू़न में लाली नहीं देख पाएगा, क्योंकि लाल रंग की रौशनी उतनी गहराई तक नहीं पहुंच सकती।
इसी प्रकार 30 से 50 मीटर तक की गहराई आते-आते नीली रौशनी भी पूरे तौर पर आत्मसात हो जाती है, आसमानी रौशनी 50 से 110 मीटर तक हरी रौशनी 100 से 200 मीटर तक पीली रौशनी 200 मीटर से कुछ ज़्यादा तक जब कि नारंगी और बैंगनी रोशनी इससे भी कुछ अघिक गहराई तक पहुंचते पहुंचते पूरे तौर पर विलीन हो जाती है। पानी में रंगों के इस प्रकार क्रमशः विलीन होने के कारण समुद्र भी परत दर परत अंधेरा करता चला जाता है,
यानि अंधेरे का प्रकटीकरण भी रौशनी की परतों (Layers) के रूप में होता है । 1000 मीटर से अधिक की गहराई में पूरा अंधेरा होता है ।
(संदर्भ: Oceans एल्डर और प्रनिटा पृष्ठ 27)

•द्वितीय: धूप की किरणें बादलों में आत्मसात हो जाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप रौशनी की किरणें इधर उधर बिखेरती है। और इसी कारण से बादलों के नीचे अंधेरे की काली परत सी बन जाती है। यह अंधेरे की पहली परत है। जब रौशनी की किरणें समुद्र के तल से टकराती हैं तो वह समुद्री लहरों की परत से टकरा कर पलटती हैं और जगमगाने जैसा प्रभाव उत्पन्न करती हैं, अतः यह समुद्री लहरें जो रौशनी को प्रतिबिंबित करती हैं अंधेरा उत्पन करने का कारण बनती हैं। गै़र प्रतिबिंबित रौशनी, समुद्र की गहराईयों में समा जाती हैं, इसलिये समुद्र के दो भाग हो गये परत के विशेष लक्षण प्रकाश और तापमान हैं जब कि अंधेरा समुद्री गहराईयों का अनोखा लक्षण है!

इसके अलावा समुद्र के धरातल और या पानी की सतह को एक दूसरे से महत्वपूर्ण बनाने वाली वस्तु भी लहरें ही हैं। अंदरूनी मौजें समुद्र के गहरे पानी और गहरे जलकुण्ड का घेराव करती हैं क्योंकि गहरे पानी का वज़न अपने ऊपर (कम गहरे वाले) पानी के मुक़ाबले में ज़्यादा होता है। अंधेरे का साम्राज्य पानी के भीतरी हिस्से में होता है। इतनी गहराई में जहां तक मछलियों की नज़र भी नहीं पहुंच सकती जबकि प्रकाश का माध्यम स्वयं मछलियों का शरीर होता हैं इस बात को पवित्र क़ुरआन बहुत ही तर्कसंगत वाक्यों में बयान करते हुए कहता हैः
उन अंधेरों के समान है, जो बहुत गहरे समुद्र की तह में हों, जिसे ऊपरी सतह की मौजों ने ढांप रखा हो, दूसरे शब्दों में, उन लहरों के ऊपर कई प्रकार की लहरें हैं यानि वह लहरें जो समुद्र की सतह पर पाई जाती हैं। इसी क्रम में पवित्र आयत का कथन है -
‘‘फिर ऊपर से बादल छाये हुए हों, तात्पर्य कि अंधेरे हैं जो ऊपर की ओर परत दर परत हैं जैसी कि व्याख्या की गई है यह बादल परत दर परत वह रूकावटें हैं जो विभिन्न परतों पर रौशनी के विभन्न रंगों को आत्मासात करते हुए अंधेरे को व्यापक बनाती चली जाती हैं।
प्रोफ़ेसर दुर्गा राव ने यह कहते हुए अपनी बात पूरी की ‘‘1400 वर्ष पूर्व कोई साधारण मानव इस बिंदु पर इतने विस्तार से विचार नहीं कर सकता था इसलिये यह ज्ञान अनिवार्य रूप से किसी विशेष प्राकृतिक माध्यम से ही आया प्रतीत होता है।

‘‘और वही है जिसने पानी से एक मानव पैदा किया, फिर उससे पीढ़ियां और ससुराल के दो पृथक कुल गोत्र (सिलसिले) चलाए। तेरा रब बड़े ही अधिकारों वाला है।” – (अल-क़ुरआन: सूर:25 आयत.54)

क्या यह सम्भव था कि चौदह सौ वर्ष पहले कोई भी इंसान यह अनुमान लगा सके कि हर एक जीव जन्तु पानी से ही अस्तित्व में आई है? इसके अलावा क्या यह सम्भव था कि अरब के रेगिस्तानों से सम्बंध रखने वाला कोई व्यक्ति ऐसा कोई अनुमान स्थापित कर लेता? वह भी ऐसे रेगिस्तानों का रहने वाला जहां पानी का हमेशा अभाव रहता हो।

अल्लाह (ईश्वर) सुब्हान व तआला की कोन कोन सी नेमतो को जुठलाओगे….???

Wednesday, October 1, 2014

Chand ko todne ki haqiqat by hakeem

हकीम दानिश चुममी वाले
बहुत समय से गैर मुस्लिम भाईयों को मुस्लिमों के इस विश्वास का मजाक उडाते देख रहा हूँ कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने चांद के दो टुकड़े कर दिए थे ..
ये लोग कहते हैं कि मुसलमान बार बार इस्लाम धर्म को विज्ञान पर खरा उतरने वाला धर्म बताते हैं, पर इस्लाम मे वर्णित चांद के तोड़ने और नबी के द्वारा बिना किसी विमान के आकाश की सैर जैसी इन अवैज्ञानिक बातों के जरिए इस्लाम भी झूठ और अंधविश्वास ही फैलाता है …

पहली बात तो हम इन भाईयों से यही कहेंगे कि इस्लाम को फैलाने के लिए अल्लाह और रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने चमत्कार दिखाने का सहारा नही लिया बल्कि इस्लाम फैला अपने उच्च नैतिक नियमों के कारण …. लेकिन आप कुरान और हदीस पढ़ेन्गे तो पाएंगे कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का चमत्कार न दिखाना भी कुफ्फार की नजरों मे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के झूठे होने का प्रमाण था और ये कुफ्फार लोगों को ये कह कहकर भड़काया करते थे कि ये कैसा नबी है जो साधारण आदमियों की तरह बाजारों मे घूमता फिरता है, यदि ये वास्तव मे नबी होता तो अल्लाह ने इसके साथ एक फरिश्ता रखा होता और ये चमत्कार दिखाता होता इस कारण, कुछ एक चमत्कार जो अल्लाह के हुक्म से नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने दिखाए, वे एक तो इसलिए ताकि कुफ्फार के आरोपों को झुठलाया जा सके,
और दूसरा कारण ये कि वे गैर मुस्लिम जो चमत्कार को ही ईश्वर की निशानी मानते थे और सम्मोहन करने वाले जादूगरो के जादू के कारण ही उन्हें ईश्वर का साथी मानने लगे थे, वे लोग भी अल्लाह के द्वारा किए गए सच्चे चमत्कार को देखकर ये जान लें कि मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को ईश्वर का सच्चा साथ प्राप्त है …

चांद के दो टुकड़े करने के लिए भी कुफ्फारे मक्का ने प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को बहुत उकसाया और ये वादे किए कि अगर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सच्चे हैं और सचमुच अल्लाह के रसूल हैं, तो वे चांद को तोड़कर दिखा दें, फिर हम इनका नबी होना तस्लीम कर लेंगे और मुसलमान हो जाएंगे …

अल्लाह और उसके नबी जानते थे कि कुफ्फार के ये दावे और वादे सिर्फ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को झूठा साबित करने की नीयत से किए गए हैं, इस्लाम कुबूल करने की नीयत से नहीं …
लेकिन यहाँ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सच्चाई को दांव पर लगाया गया था सो अल्लाह की मर्ज़ी से नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उंगलियों के इशारे से चांद के दो टुकड़े कर के अपनी सच्चाई का सबूत भी कुफ्फार को दिया, और कुफ्फार का ये झूठ भी दुनिया के सामने ले आए कि चांद के टूटते ही वो मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का नबी होना तस्लीम कर के ईमान ले आएंगे ….
कुफ्फारे मक्का चांद के तोड़े जाने को जादू कहकर इस सच से इनकार करने लगे, और न नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को उन्होंने नबी तस्लीम किया, न मुसलमानों को यातनाएँ देनी बंद कीं…

बहरहाल … चांद के दो टुकड़े होने का ये वाकया सच्चा था ये हम आज भी पूरे दावे से कहते हैं … नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) द्वारा चन्द्रमा के तोड़े जाने की इस घटना ने कई वैज्ञानिक तथ्यों को भी स्पष्ट कर दिया जिनकी पुष्टि आज भी अंतरिक्ष विज्ञानी करते हैं… –

» 1 – चांद को देखकर दुनिया मे पहले की आबादियां उसे एक ठण्डी रौशनी का पुन्ज समझती थीं जैसे सूरज एक गर्म प्रकाश पुंज है, और रौशनी को न छुआ जा सकता है न ही तोड़ा जा सकता है , इस्लाम से पहले चांद को कोई भी व्यक्ति ऐसी ठोस वस्तु नहीं मानता था जिसे स्पर्श किया जा सकता हो …. ये खयाल बीसवीं शताब्दी तक लोगों मे बना रहा जब तक नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर उतर कर ये साबित न किया कि चांद मिट्टी और चट्टानों से बना एक विशाल उपग्रह है … लेकिन चांद के तोड़े जाने के वाकये से इस्लाम ने 1400 साल पहले ही ये सिद्ध कर दिया कि चांद एक ठोस आकाशीय संरचना है …

» 2 - पूरी दुनिया के लोगों मे चांद को देवता या दैवीय शक्ति आदि मानने का भी चलन था इस्लाम से पूर्व … लेकिन चांद को तोड़कर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ये सिद्ध किया कि चांद एक ठोस निर्जीव आकाशीय पिण्ड से अधिक कुछ नहीं और उसमें कोई दैवीय शक्ति नहीं, और न ही वो कोई देवता है…. दुनिया भर के अनेक गैर मुस्लिम अब तक चांद मे दैवीय शक्तियों का वास समझते थे, लेकिन अपने इतिहास से लेकर आज तक मुस्लिमों ने ऐसा अंधविश्वास चांद के विषय मे कभी नहीं रखा ॥

» 3 – चांद के तोड़ने के मुस्लिमो के इस दावे ने इस सम्भावना को भी दुनिया के सामने रखा कि यदि 1400 वर्ष पहले चांद को तोड़कर जोड़ा गया था, तो इस बात के चिन्ह आज भी चांद की सतह पर मिलने चाहिए,
आज हमारे पास NASA द्वारा लिये गये चांद की सतह के कुछ चित्र हैं, जिनमें चांद की सतह पर एक विशाल दरार दिखाई पड़ रही है …. जैसे किसी टूटी हुई चीज़ दोबारा जोड़कर रखने पर बन जाती है ….. हम जानते है कि विरोधी इस दरार के चन्द्रमा की सतह पर होने के भी अलग अलग कयास निकालेंगे पर चांद के टूटने की बात नहीं मानेंगे… पर इस्लाम मे चांद के टूटने के विश्वास का मजाक ये लोग तब उड़ा सकते थे जब चांद पर ऐसी कोई दरार न मिली होती ….. इस दरार के पाये जाने के बावजूद यदि लोग चांद के टूटने की सम्भावना पर विचार न करें तो इसे उन लोगों के पूर्वाग्रह का ही परिणाम कहा जाएगा…

बहरहाल जो लोग चांद के टूटने को इस्लाम का अंधविश्वास साबित करना चाहते हैं, वे अपनी इस बात कि चांद कभी नहीं टूटा था को सिद्ध करने का कोई प्रमाण नहीं दे सकते …. लेकिन चांद टूटा था इस बात का एक बड़ा प्रमाण मुस्लिमों के पास अवश्य है !!
Chand, Mojza , Mojza-e-Rasool , Moon , Science and Islam