Saturday, May 2, 2015

किरदार का अक्स भाग 3

किरदार का अक्स भाग 3
******किरदार का अक़्स*****

----- सफहा 1 और 2 से आगे ----

एक ऐसी खूबसूरत और सच्ची कहानी कि आपकी ईमान ताज़ा कर दे
फुर्सत मिले तो जरूर पढियेगा.....

जाने से पहले उसने अपने दोस्त से पूछा कि यह कौन सी किताब है?????

त्युन्सी दोस्त ने कहा...... ये हम मुसलमानों की किताब क़ुरआन है....!!!!

जाद ने पूछा कि मुसलमान कैसे बनते हैं?????

त्युन्सी दोस्त ने कहा ..... कलमा ए शहादत पढ़ते हैं और फिर शरीयत पर अमल करते हैं ........

जाद ने कहा.... तो फिर सुन लो मैं कलमा ए शहादत पढ़ रहा हूँ......
"अश्शहादुअन्ना लाइलाहा इल्लल्लाह"
"व अश्शाहदुअन्ना मुहम्मदन रसूल्लाल्लाह (स.अ.व)
जाद मुसलमान हो गया और अपने लिये 
"जादल्लाह क़ुरआनी" नाम पसंद किया।
नाम का इख़्तियार उसकी क़ुरआन से बेहताशा मुहब्बत का सबूत था।जादल्लाह ने क़ुरआन की तालीम हासिल की, दींन को समझा और उसकी तब्लीग शुरू की। यूरोप में उनके हाथ पर 6 हजार से जायद लोगों ने इस्लाम कबूल किया!!!!!!!!!

एक दिन पुराने कागज़ात को देखते हुए जादल्लाह को अंकल इब्राहिम के दिये हुए क़ुरआन में दुनिया का एक नक़्शा नजर आया जिसमें बरअज़्म अफ्रीका के इर्द -गिर्द लकीर खींची हुई थी ।
और अंकल के दस्तखत किये हुए थे ।
साथ में अंकल के हाथ से ही ये आयते करीमा लिखी हुई थी.......
(हिंदी में आयत ठीक से न लिख पाने की वजह से सिर्फ तर्जुमा ही लिख रहा हूँ) "अपने रब के रास्ते की तरफ दावत दो हिकमत और नसीहत के साथ....!!!!!

जादल्लाह को ऐसा लगा जैसे ये अंकल की उनके लिये वसीयत हो। और उसी वक़्त जादल्लाह ने उस वसीयत पर अमल करने की ठानी। जादल्लाह ने यूरोप को खैर बाद कहा और कीनिया ,सूडान,युगांडा,और उसके आस-पास के मुमालिक को अपना मिशन बनाया, दावत -ए- हक़ के लिये हर मुश्किल और खतरनाक रास्ते पर चलने से नहीं हिचकिचाये और "अल्लाह रब्बुल इज्जत" ने उनके हाथों "साठ लाख "इंसानों को दीं ए इस्लाम की रौशनी से नवाज़ा........!!!!!!

जादल्लाह ने अफ्रीका के कठिन माहौल में अपनी जिंदगी के 30 साल गुजार दिये।
सन् 2003 में अफ़्रीका में पाई जाने वाली बीमारियों में घिरकर महज 54 साल की उम्र में अपने ख़ालिक़ हकीकी को जा मिले........!!!!!!!

जादल्लाह के मेहनत के मुताबिक़ उनकी वफ़ात के बाद भी लोगों के इस्लाम कबूलने की सिलसिला जारी है।
वफ़ात के ठीक दो साल बाद उनकी माँ सत्तर (70) साल की उम्र में इस्लाम कबूल किया........
जादल्लाह अक्सर याद किया करते थे कि अंकल इब्राहिम ने उनके सत्तरह (17) सालों में कभी भी उन्हें गैर मुस्लिम महसूस नहीं होने दिया और ना ही कभी कहा कि इस्लाम कबूल कर लो। मगर उनका रवैय्या ऐसा था कि जाद का इस्लाम कबूल किये बगैर कोई चारा न था.....

मेरे दोस्तों आखिर में यही कहूँगा कि जितना हो सके अपने अच्छे किरदार को उजागर करें । क्योंकि हमारी जुबान से निकली हुई बात को हो सकता है कोई ईनकार भी कर दे लेकिन जिस बात को हम अपीने किरदार से और दिल की गहराइयों से शुरू करेंगे तो उसे कोई नहीं झुठला सकता.... शुक्रिया
हकीम दानिश.

किरदार का अक्स भाग 2

किरदार का अक्स भाग 2
**** किरदार का अक़्स*****भाग 2
सफह एक से आगे की कहानी....

एक ऐसी खूबसूरत और सच्ची कहानी कि आपके ईमान को ताज़ा कर दे....
फुरसत मिले तो पढियेगा जरूर....

.....और इसी तरह एक के बाद एक करते हुए सत्तरह साल गुजर गए
सत्तरह साल बाद जब जाद चौबीस साल का नौजवान बना तो अंकल इब्राहिम भी उस हिसाब से सड़सठ साल के हो चुके थे.... दाई अजल का बुलावा आया और अंकल वफ़ात पा गए उन्होंने अपने बेटों के पास जाद के लिये एक छोटी सी संदूक छोड़ी थी। उनकी वसीयत थी कि उनके मरने के बाद ये संदूक उस यहूदी नौजवान जाद को तोहफा में दे दी जाय ।
जाद को जब अंकल इब्राहिम के बेटों ने संदूक दी और अपने वालिद के मरने के बारे में बताया तो जाद बहुत ही ग़मगीन हो गया क्योंकि अंकल ही तो उसकी गम को हल करने वाले थे..... जाद ने सन्दुक
खोलकर देखि तो अंदर वही किताब थी जिसे खोलकर अंकल को दिया करता था ..... 
जाद अंकल की निशानी को घर में रखकर दूसरे कामों में मशगूल हो गया 
मगर एक दिन उसे किसी गम ने आ घेरा 
आज अंकल होते तो वह उन्हें किताब खोलकर देता और अंकल दो सफ़हे पढ़ते और मसअले का हल सामने आ जाता ....जाद के दिल में अंकल का ख्याल आया और उसके आँसू निकल आये...... क्यों ना आज मैं खुद कोशिश करूँ किताब खोलते हुए वह अपने आप से मुखातिब हुआ ...... लेकिन....... किताब की जुबान और लिखाई उसकी समझ से बालातर थी। किताब उठाकर अपने त्युन्सी दोस्त के पास गया और उससे कहा कि मुझे इसमें से दो सफ़हे पढ़कर सुनाओ ..... मतलब पूछा और खुद ही अपने दिमाग से अपने मसअले का हल निकाल लिया .....
वापस जाने से पहले उसने अपने दोस्त से पूछा ये कैसी किताब है ??????
.......जारी है.. अगली पोस्ट में...
कल इंशा अल्लाह अगली पोस्ट की जायेगी
हकीम दानिश

Friday, May 1, 2015

किरदार का अक्स

किरदार का अक्स
*****किरदार का अक़्स***** भाग 1

एक ऐसी खूबसूरत और सच्ची कहानी कि आपकी ईमान को ताज़ा कर दे ।
फुर्सत मिले तो जरूर पढियेगा.....

ये तक़रीबन 1957 की बात है फ्रांस में कहीं एक रिहायशी इमारत की नुक्कड़ में तुर्की के एक पचास साल के बूढ़े आदमी ने छोटी सी दूकान खोल रखी थी । इर्द गिर्द के लोग उस बूढ़े शख्स को अंकल इब्राहिम के नाम से जानते और पुकारते थे।अंकल इब्राहिम की दूकान में छोटी- मोटी घरेलू जरूरियात की चीजों के अलावा बच्चों के लिये चॉकलेट , आइसक्रीम और गोलियाँ,टाफियां भी मौजूद थीं.....
उसी इमारत में एक मंजिल पर एक यहूदी खानदान आबाद था जिनका एक सात साल का बच्चा (जाद) था।
जाद तक़रीबन रोजाना ही अंकल की दूकान पर घर की जरूरियात की छोटी-मोटी चीजें खरीदने के लिये आता था। दूकान से जाते हुए अंकल इब्राहिम को किसी और काम में मशगूल पाकर जाद ने कभी भी एक चॉकलेट चोरी करना ना भुला थी। एक बार जाद दूकान सइ जाते वक़्त चॉकलेट चोरी करना भूल गया....
अंकल इब्राहिम ने पीछे से जाद को आवाज़ देते हुए कहा कि "जाद" आज चॉकलेट नहीं उठाओगे क्या?????
अंकल इब्राहिम यह बात मुहब्बत में कही थी या दोस्ती से मगर जाद के लिये एक सदमे से बढ़कर था.....
जाद आजतक यही समझता था कि उसकी चोरी एक राज़ था मगर मुआमला उसके बरअक्स था।जाद ने गिड़गिड़ाते हुए अंकल इब्राहिम से कहा कि ... वह उसे माफ़ कर दें तो आइन्दा वह कभी भी चोरी नहीं करेगा....
मगर अंकल इब्राहिम ने जाद से कहा कि अगर तुम वादा करो कि अपनी जिंदगी में कभी भी किसी की चोरी नहीं करोगे तो रोजाना का एक चॉकलेट मेरी तरफ से तुम्हारा हुआ..... हर बार दूकान से घर जाते वक़्त ले जाया करना .....
और आखिरकार इसी बात पर जाद और अंकल का इत्तेफ़ाक़ हो गया.....
वक़्त गुजरता गया और उस यहूदी बच्चे जाद और अंकल इब्राहिम की मुहब्बत गहरी से भी गहरी होती गई। बल्कि ऐसा हो गया कि अंकल इब्राहिम ही जाद के लिये ( माँ,बाप,और दोस्त) का दर्जा इख़्तियार कर चुके थे.........
जाद को जब कभी भी किसी मसअले का सामना होता या परेशानी होती तो अंकल इब्राहिम से ही कहता । ऐसे में अंकल मेज की दराज से एक किताब निकालते और जाद से कहते कि किताब को "कहीं से भी खोलकर" दो ।जाद किताब खोलता और अंकल वहीँ से 2 सफ़हे पढ़ते और जाद को मसअले का हल बताते जाद का दिल इत्मीनान पाता और वो अपने घर को चला जाता ।

और इसी तरह एक के बाद एक करते सत्तरह साल गुजर गए........
सत्तरह साल बाद जब जाद चौबीस साल कअ नौजवान..............

जारी है अगली पोस्ट में.