Thursday, February 12, 2015

सूरतुल फ़ातिहा के बारे में कुछ मालूमात

सूरतुल फ़ातिहा के बारे में कुछ मालूमात

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

सूरतुल फ़ातिहा

मक्का में उतरी : आयतें सात, रुकु एक, अल्लाह के नाम सेशुरु जो बहुतमेहरबान रहमतवाला
1. सब खू़बियाँ अल्लाह को जो मालिक सारे जहान वालों का
2. बहुत मेहरबान रहमत वाला
3. रोज़े जज़ा (इन्साफ के दिन) का मालिक
4. हम तुझी को पूजें और तुझी से मदद चाहें
5. हमको सीधा रास्ता चला
6. रास्ता उनका जिन पर तूने एहसान किया
7. न उन का जिन पर ग़ज़ब (प्रकोप) हुआ और न बहके हुओं का

तफसीर – सुरतुल फातिहा
अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान रहमत वाला, अल्लाह की तअरीफ़ और उसके हबीब पर दरुद.

सूरए फातिहा के नाम :
इस सूरत के कई नाम हैं – फा़तिहा, फा़तिहतुल किताब, उम्मुल कु़रआन, सूरतुल कन्ज़, काफि़या, वाफ़िया, शाफ़िया, शिफ़ा, सबए मसानी, नूर, रुकै़या, सूरतुल हम्द, सूरतुल दुआ़ तअलीमुल मसअला, सूरतुल मनाजात सूरतुल तफ़वीद, सूरतुल सवाल, उम्मुल किताब, फा़तिहतुल क़ुरआन, सूरतुस सलात.
इस सूरत में सात आयतें, सत्ताईस कलिमें, एक सौ चालीस अक्षर हैं. कोई आयत नासिख़ या मन्सूख़ नहीं.

शानें नज़ूल यानी किन हालात में उतरी :
ये सूरत मक्कए मुकर्रमा या मदीनए मुनव्वरा या दोनों जगह उतरी. अम्र बिन शर्जील का कहना है कि नबीये करीम (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम – उन पर अल्लाह तआला के दुरुद और सलाम हों) ने हज़रत ख़दीजा(रदियल्लाहो तआला अन्हा – उनसे अल्लाह राज़ी) से फ़रमाया – मैं एक पुकार सुना करता हूँ जिसमें इक़रा यानी ‘पढ़ों’ कहा जाता है. वरक़ा बिन नोफि़ल को खबर दी गई, उन्होंने अर्ज़ किया – जब यह पुकार आए, आप इत्मीनान से सुनें. इसके बाद हज़रत जिब्रील ने खि़दमत में हाजि़र होकर अर्ज़ किया-फरमाइये: बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम. अल्हम्दु लिल्लाहे रब्बिल आलमीन- यानी अल्लाह के नाम से शुरु जो बहुत मेहरबान, रहमत वाला, सब खूबियाँ अल्लाह को जो मालिक सारे जहान वालों का. इससे मालूम होता है कि उतरने के हिसाब से ये पहली सूरत है मगर दूसरी रिवायत से मालूम होता है कि पहले सूरए इक़रा उतरी. इस सूरत में सिखाने के तौर पर बन्दों की ज़बान में कलाम किया गया है.
नमाज़ में इस सूरत का पढ़ना वाजिब यानी ज़रुरी है. इमाम और अकेले नमाज़ी के लिये तो हक़ीक़त में अपनी ज़बान से, और मुक्तदी के लिये इमाम की ज़बान से. सही हदीस में है इमाम का पढ़ना ही उसके पीछे नमाज़ पढ़ने वाले का पढ़ना है. कुरआन शरीफ़ में इमाम के पीछे पढ़ने वाले को ख़ामोश रहने और इमाम जो पढ़े उसे सुनेने का हुक्म दिया गया है. अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जब क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे सुनो और खा़मोश रहो. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस है कि जब इमाम क़ुरआन पढ़े, तुम ख़ामोश रहो. और बहुत सी हदीसों में भी इसी तरह की बात कही गई है. जनाजे़ की नमाज़ में दुआ याद न हो तो दुआ की नियत से सूरए फ़ातिहा पढ़ने की इजाज़त है. क़ुरआन पढ़ने की नियत से यह सूरत नहीं पढ़ी जा सकती.

सूरतुल फ़ातिहा की खूबियाँ:
हदीस की किताबों में इस सूरत की बहुत सी ख़ूबियाँ बयान की गई है.
हुजू़र सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमाया तौरात व इंजील व जु़बूर में इस जैसी सूरत नहीं उतरी.(तिरमिज़ी).
एक फ़रिश्ते ने आसमान से उतरकर हुजू़र सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर सलाम अर्ज़ किया और दो ऐसे नूरों की ख़ूशख़बरी सुनाई जो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पहले किसी नबी को नहीं दिये गए. एक सूरए फ़ातिहा दूसरे सुरए बक्र की आख़िरी आयतें.(मुस्लिम शरीफ़)
सूरए फा़तिहा हर बीमारी के लिए दवा है. (दारमी).
सूरए फ़ातिहा सौ बार पढ़ने के बाद जो दुआ मांगी जाए, अल्लाह तआला उसे क़ुबूल फ़रमाता है. (दारमी)

इस्तिआजा: क़ुरआन शरीफ़ पढ़ने से पहले “अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम” (अल्लाह की पनाह मांगता हूँ भगाए हुए शैतान से) पढ़ना प्यारे नबी का तरीक़ा यानी सुन्नत है. (ख़ाज़िन) लेकिन शागिर्द अगर उस्ताद से पढ़ता हो तो उसके लिए सुन्नत नहीं है. (शामी) नमाज़ में इमाम और अकेले नमाज़ी के लिये सना यानी सुब्हानकल्लाहुम्मा पढ़ने के बाद आहिस्ता से “अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम” पढ़ना सुन्नत हैं.

तस्मियह: बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम क़ुरआने पाक की आयत है मगर सूरए फ़ातिहा या किसी और सूरत का हिस्सा नहीं है, इसीलिये नमाज़ में ज़ोर के साथ् न पढ़ी जाए. बुखारी और मुस्लिम शरीफ़ में लिखा है कि प्यारे नबी हुजू़र सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हज़रत सिद्दीक़ और फ़ारूक़ (अल्लाह उनसे राज़ी) अपनी नमाज़ “अलहम्दोलिल्लाहेरब्बिलआलमीन“यानी सूरए फ़ातिहा की पहली आयत से शुरू करते थे. तरावीह (रमज़ान में रात की ख़ास नमाज़) में जो ख़त्म किया जाता है उसमें कहीं एक बार पूरी बिस्मिल्लाह ज़ोर से ज़रूर पढ़ी जाए ताकि एक आयत बाक़ी न रह जाए.
क़ुरआन शरीफ़ की हर सूरत बिस्मिल्लाह से शुरू की जाए, सिवाय सूरए बराअत या सूरए तौबह के. सूरए नम्ल में सज्दे की आयत के बाद जो बिस्मिल्लाह आई है वह मुस्तक़िल आयत नहीं है बल्कि आयत का टुकड़ा है. इस आयत के साथ ज़रूर पढ़ी जाएगी, आवाज़ से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों में आवाज़ के साथ और खा़मोशी से पढ़ी जाने वाली नमाज़ों में ख़ामोशी से. हर अच्छे काम की शुरूआत बिस्मिल्लाह पढ़कर करना अच्छी बात है. बुरे काम पर बिस्मिल्लाह पढ़ना मना है.

सूरए फ़ातिहा में क्या क्या है?
इस सूरत में अल्लाह तआला की तारीफ़, उसकी बड़ाई, उसकी रहमत, उसका मालिक होना, उससे इबादत, अच्छाई, हिदायत, हर तरह की मदद तलब करना, दुआ मांगने का तरीक़ा, अच्छे लोगों की तरह रहने और बुरे लोगों से दूर रहने, दुनिया की ज़िन्दगी का ख़ातिमा, अच्छाई और बुराई के हिसाब के दिन का साफ़ साफ़ बयान है.

हम्द यानि अल्लाह की बड़ाई बयान करना….
हर काम की शुरूआत में बिस्मिल्लाह की तरह अल्लाह की बड़ाई का बयान भी ज़रूरी है. कभी अल्लाह की तारीफ़ और उसकी बड़ाई का बयान अनिवार्य या वाजिब होता है जैसे जुमुए के ख़त्बे में, कभी मुस्तहब यानी अच्छा होता है जैसे निकाह के ख़ुत्बे में या दुआ में या किसी अहम काम में और हर खाने पीने के बाद. कभी सुन्नते मुअक्कदा (यानि नबी का वह तरीक़ा जिसे अपनाने की ताकीद आई हो)जैसे छींक आने के बाद. (तहतावी)

“रब्बिल आलमीन“ (यानि मालकि सारे जहां वालों का)में इस बात की तरफ इशारा है कि सारी कायनात या समस्त सृष्टि अल्लाह की बनाई हुई है और इसमें जो कुछ है वह सब अल्लाह ही की मोहताज है. और अल्लाह तआला हमेशा से है और हमेशा के लिये है, ज़िन्दगी और मौत के जो पैमाने हमने बना रखे हैं, अल्लाह उन सबसे पाक है, वह क़ुदरत वाला है.”रब्बिल आलमीन” के दो शब्दों में अल्लाह से तअल्लुक़ रखने वाली हमारी जानकारी की सारी मन्ज़िलें तय हो गई.

“मालिके यौमिद्दीन” (यानि इन्साफ वाले दिन का मालिक) में यह बता दिया गया कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं है क्योंकि सब उसकी मिल्क में है और जो ममलूक यानी मिल्क में होता है उसे पूजा नहीं जा सकता. इसी से मालूम हुआ कि दुनिया कर्म की धरती है और इसके लिये एक आख़िर यानी अन्त है. दुनिया के खत्म होने के बाद एक दिन जज़ा यानी बदले या हिसाब का है. इससे पुनर्जन्म का सिद्धान्त या नज़रिया ग़लत साबित हो गया.

“इय्याका नअबुदु” (यानि हम तुझी को पूजें) अल्लाह की ज़ात और उसकी खूबियों के बयान के बाद यह फ़रमाना इशारा करता है कि आदमी का अक़ीदा उसके कर्म से उपर है और इबादत या पूजा पाठ का क़ुबूल किया जाना अक़ीदे की अच्छाई पर है. इस आयत में मूर्ति पूजा यानि शिर्क का भी रद है कि अल्लाह तआला के सिवा इबादत किसी के लिये नहीं हो सकती.

“वइय्याका नस्तईन” (यानि और तुझी से मदद चाहें)में यह सिखाया गया कि मदद चाहना, चाहे किसी माध्यम या वास्ते से हो, या फिर सीधे सीधे या डायरैक्ट, हर तरह अल्लाह तआला के साथ ख़ास है. सच्चा मदद करने वाला वही है. बाक़ि मदद के जो ज़रिये या माध्यम है वा सब अल्लाह ही की मदद के प्रतीक या निशान है. बन्दे को चाहिये कि अपने पैदा करने वाले पर नज़र रखे और हर चीज़ में उसी के दस्ते क़ुदरत को काम करता हुआ माने. इससे यह समझना कि अल्लाह के नबियों और वलियों से मदद चाहना शिर्क है, ऐसा समझना ग़लत है क्योंकि जो लोग अल्लाह के क़रीबी और ख़ास बन्दे है उनकी इमदाद दर अस्ल अल्लाह ही की मदद है. अगर इस आयत के वो मानी होते जो वहाबियों ने समझे तो क़ुरआन शरीफ़ में “अईनूनी बि क़ुव्वतिन” और “इस्तईनू बिस सब्रे वसल्लाह” क्यों आता, और हदीसों में अल्लाह वालों से मदद चाहने की तालीम क्यों दी जाती.

“इहदिनस सिरातल मुस्तक़ीम”(यानी हमको सीधा रास्ता चला) इसमें अल्लाह की ज़ात और उसकी ख़ूबियों की पहचान के बाद उसकी इबादत, उसके बाद दुआ की तालीम दी गई है. इससे यह मालूम हुआ कि बन्दे को इबादत के बाद दुआ में लगा रहना चाहिये. हदीस शरीफ़ में भी नमाज़ के बाद दुआ की तालीम दी गई है. (तिबरानी और बेहिक़ी) सिराते मुस्तक़ीम का मतलब इस्लाम या क़ुरआन नबीये करीम (अल्लाह के दुरूद और सलाम उनपर) का रहन सहन या हुज़ूर या हुज़ूर के घर वाले और साथी हैं. इससे साबित होता है कि सिराते मुस्तक़ीम यानी सीधा रास्ता एहले सुन्नत का तरीक़ा है जो नबीये करीम सल्लाहो अलैहे वसल्लम के घराने वालों, उनके साथी और सुन्नत व क़ुरआन और मुस्लिम जगत सबको मानते हैं.

“सिरातल लज़ीना अनअम्ता अलैहिम”(यानी रास्ता उनका जिनपर तुने एहसान किया) यह पहले वाले वाक्य या जुमले की तफ़सील यानी विवरण है कि सिराते मुस्तक़ीम से मुसलमानों का तरीक़ा मुराद है. इससे बहुत सी बातों का हल निकलता है कि जिन बातों पर बुज़ुर्गों ने अमल किया वही सीधा रास्ता की तारीफ़ में आता है.

“गै़रिल मग़दूबे अलैहिम वलद दॉल्लीन “(यानी न उनका जिनपर ग़ज़ब हुआ और न बहके हुओ का) इसमें हिदायत दी गई है कि सच्चाई की तलाश करने वालों को अल्लाह के दुश्मनों से दूर रहना चाहिये और उनके रास्ते, रश्मों और रहन सहन के तरीक़े से परहेज़ रखना ज़रूरी है. हदीस की किताब तिरमिजी़ में आया है कि “मग़दूबे अलैहिम” यहूदियों और “दॉल्लीन” इसाईयों के लिये आया है.

सूरए फ़ातिहा के ख़त्म पर “आमीन” कहना सुन्नत यानी नबी का तरीक़ा है, “आमीन” के मानी है “ऐसा ही कर” या “कु़बूल फ़रमा”. ये क़ुरआन का शब्द नहीं है. सूरए फ़ातिहा नमाज़ में पढ़ी जाने या नमाज़ के अलावा, इसके आख़िर में आमीन कहना सुन्नत है.
हज़रत इमामे अअज़म का मज़हब यह है कि नमाज़ में आमीन आहिस्ता या धीमी आवाज़ में कही जाए.हकीम दानिश

Friday, October 17, 2014

हदीस भाग 4

हदीस भाग 4
हकीम दानिश
हदीसें हदीसें 
चौथा भाग
151. أَدَلُّ شَيء عَلى غَزارَةِ العَقلِ حُسنُ التَدبيرِ;
बुद्धिमान होने की सब से बड़ी दलील, अच्छी तदबीर व उपाय है। 
152. أَفضَلُ النّاسِ رَأياً مَن لا يَستَغنِي عَن رَأي مُشير;
सब से अच्छी राय उस इन्सान की है जो स्वयं को मशवरा देने वाले की राय से मुक्त न समझता हो।
153. أَفضَلُ الجُودِ اِيصالُ الحُقُوقِ إلى اَهلِها
सब से बड़ा दान व सखावत, हकदारों तक उनके हक पहुंचाना है 
154. أَكبَرُ الكُلفَةِ تَعَنُيكَ فِيما لا يَعنيكَ
सब से बड़ा दुख व तकलीफ़, उस चीज़ में मेहनत करना है जिस से तुम्हें कोई फ़ायदा न हो। 
155. أَكبَرُ العَيبِ أن تَعيبَ غَيرَكَ بِما هُوَ فيكَ
सब से बड़ी बुराई, दूसरों की उस बुराई को पकड़ना है जो स्वयं में भी पाई जाती है। 
156. أَخسَرُ النّاسِ مَن قَدَرَ عَلى اَن يَقُولَ الحَقَّ وَلَم يَقُل
सब से अधिक नुक़्सान में वह लोग हैं जो हक़ बात कहने की ताक़त रखते हुए, हक़ बात न कहें।
157. أَبخَلُ النّاسِ مَن بَخِلَ بِالسَّلامِ
सब से अधिक कंजूस वह लोग हैं जो सलाम करने में कंजूसी करें।
158. أَشَدُّ مِنَ المَوتِ طَلَبُ الحاجَةِ مِن غَيرِ أَهلِها
नीच से कोई चीज़ माँगना, मौत से भी अधिक कठिन है। 
159. أَعقَلُ النّاسِ مَن كانَ بِعَيبِهِ بَصيراً وَعَن عَيبِ غَيرِهِ ضَريراً
सब से अधिक बुद्धिमान इन्सान वह है जो अपनी बुराइयों को देखे और दूसरों की बुराइयों को न देखे।
160. أَفضَلُ الأدَبِ أن يَقِفُ الإنسانُ عِندَ حَدِّهِ وَلا يَتَعدَّى قَدرَهُ
सब से अच्छा सदाचार यह है कि इन्सान अपनी हद में रहे और उस से बाहर न निकले।
161. إِنَّ أهنَأَ النّاسِ عَيشاً مَن كانَ بِما قَسَمَ اللهُ لَهُ راضِياً
सब से अच्छा जीवन उसका है जो उस पर प्रसन्न रहे, जो उसे अल्लाह ने दिया है। 
162. اِنَّ مِنَ العِبادَةِ لِينَ الكَلامِ وَإفشاءَ السَّلامِ
नर्मी के साथ बात करना और ऊँची आवाज़ में सलाम करना इबादतों में से है।
163. إِنَّ هذِهِ القُلُوبَ اَوعِيَةٌ فَخَيرُها اَوعاها لِلخَيرِ
यह दिल बर्तन (के समान) हैं और इन में सब से अच्छा बर्तन वह है जिस में नेकियां अधिक आयें।
164. إِنَّ بِشرَ المُؤمِنِ فِي وَجهِهِ، وَقُوَّتَهُ فِي دينِهِ وَحُزنَهُ فِي قَلبِهِ
मोमिन की खुशी उसके चेहरे पर, उसकी ताक़त उसके दीन में और उसका ग़म उसके दिल में होता है।
165. إنَّ هذِهِ القُلُوبَ تَمِلُّ کما تمل الأبدانُ فَابتَغُوا لَها طَرائِفَ الحِكَمِ
दिल, बदन की तरह थक जाते हैं, उन्हें खुश करने के लिये नया ज्ञान व बुद्धिमत्ता तलाश करो।
166. إنَّ أفضَلَ الخَيرِ صَدَقَةُ السِّرِّ وَبِرُّ الوالِدَينِ وَصِلَةُ الرَّحِمِ
सब से अच्छी नेकी छिपा कर सदका देना, माँ बाप के साथ भलाई करना और सिला –ए- रहम (रिश्तेदारों के साथ मेल जोल से रहना) करना है।
167. إنَّ النّاسَ إلى صالِحِ الأدَبِ أحوَجُ مِنهُم إلَى الفِضَّةِ وَالذَّهَبِ; 
लोगों को सदाचार की ज़रुरत, सोने चांदी से अधिक है। 
168. إنَّ حَوائِجَ النّاسِ إلَيكُم نِعمَةً مِنَ اللهِ عَلَيكُم فَاغتَنِمُوها وَلا تَمَلُّوها فَتَتَحَوَّلَ نَقَماً
तुम से लोगों की ज़रुरतों का जुडा होना, तुम्हारे लिए अल्लाह की नेमत है, उसे अच्छा समझो और उस से दुखी न हो वर्ना वह निक़मत में बदल जायेगी। (निक़मत शब्द हर प्रकार की बुराई को सम्मिलित है) 
169. اِن كُنتُم تُحِبُّونَ اللهَ فَأخِرِجُوا مِن قُلُوبِكُم حُبَّ الدُّنيا
अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो अपने दिल से दुनिया की मोहब्बत निकाल दो।
170. إن تَنَزَّهُوا عَنِ المَعاصِي يُحبِبكُمُ اللهُ
अगर तुम गुनाहों से पाक हो जाओ तो अल्लाह तुम से मोहब्बत करेगा।
171. إنَّكَ إن أطَعتَ اللهَ نَجّاكَ وأصلَحَ مَثواكَ
अगर तुम अल्लाह की आज्ञा का पालन करो तो वह तुम्हें निजात (मुक्ति) देगा और तुम्हारे ठिकाने को अच्छा बना देगा। 
172. إنَّكَ لَن يُغنِي عَنَكَ بَعدَ المَوتِ إلاّ صالِحُ عَمَل قَدَّمتَهُ فَتَزَوَّد مِن صالِحِ العَمَلِ
मरने के बाद, तुम्हें तुम्हारे उन कार्यों के अलावा कोई चीज़ फायदा नहीं पहुंचायेगी जो तुम ने आगे भेज दिये हैं अतः नेक कामों को तुम अपना तोशा बना लो। (यात्रा के दौरान काम आने वाली हर चीज़ को तोशा कहते हैं, यहाँ पर इस बात की ओर इशारा किया गया है कि परेलोक की यात्रा के लिए अच्छे कार्यों को इकठ्ठा करो ताकि वह इस यात्रा में तुम्हारे काम आयें।)
173. اِنَّمَا العاقِلُ مَن وَعَظَتَهُ التَّجارِبُ
बुद्धिमान वह है जो अपने तजुर्बों से शिक्षा ले।
174. إنَّما سُمِّيَ العَدُوُّ عَدُوّاً لاَِنَّهُ يَعدُو عَلَيكَ فَمَن داهَنَكَ فِي مَعايِبِكَ فَهُوَ العَدُوُّ العادي عَلَيَكَ
दुश्मन को दुश्मन इस लिये कहा जाता है, क्योंकि वह तुम्हारे ऊपर अत्याचार करता है, अतः जो तुम्हें तुम्हारी बुराइयाँ बाताने से बचे, वह तुम्हारा दुश्मन है क्योंकि उसने तुम पर अत्याचार किया है।
175. إنَّما زُهدَ النّاسِ في طَلَبِ العِلمِ كَثرَةُ ما يَرَونَ مِن قِلَّةِ مَن عَمِلَ بِما عَلِمَ
जिस चीज़ ने इंसानों को ज्ञान प्राप्ति से रोका है, वह यह है कि बहुतसे देखते हैं कि अपने अपने इल्म पर अमल करने वाले अर्थात अपने ज्ञान पर क्रियान्वित होने वाले कम हैं।
176. إنَّما قَلبُ الحَدَثِ كَالأرضِ الخالِيَةِ مَهما أُلقِيَ فيها مِن كُلِّ شَيء قَبِلَتهُ;
नौजवान का दिल उस ज़मीन के समान है जिस में अभी खेती न की गई हो अतः उस में जो कुछ डाला जायेगा वह उसे ही स्वीकार कर लेगा। 
177. إذا صَنَعتَ مَعرُوفاً فَاستُرهُ
जब कोई नेकी करो तो उसे छिपा लो।
178. إذا صُنِعَ اِلَيكَ مَعرُوفٌ فَاذكُر
जब तुम से कोई भलाई करे तो उसे याद रखो।
179. إذا تَمَّ العَقلُ نَقَصَ الكَلامُ
जब बुद्धी पूर्ण हो जाती है तो बातें कम हो जाती हैं। 
180. إذا أَضَرَّتِ النَّوافِلُ بِالفَرائِضِ فَارفُضُوها
जब मुस्तहब चीज़ें, वाजिब चीज़ों को नुक्सान पहुंचाने लगें तो उन्हें छोड़ दो।
181. إذا ظَهَرَتِ الجِناياتُ ارتَفَعَتِ البَرَكاتُ; 
जब बुरे काम व गुनाह खुले आम होने लगते हैं तो बरकत ख़त्म हो जाती है। 
182. إذا رَأيتَ عالِماً فَكُن لَهُ خادِماً
जब आलिम को देखो तो उसकी सेवा करो। 
183. إذا قامَ أحَدُكُم إِلَى الصَّلاةِ فَليُصَلِّ صَلاةَ مُوَدِّع
जब तुम में से कोई नमाज़ के लिये खड़ा हो तो इस तरह नमाज़ पढ़े जैसे वह उसकी आखरी नमाज़ है।
184. إذا أبصَرَتِ العَينُ الشَّهوَة عَمِيَ القَلبُ عَنِ العاقِبَةِ; 
जब आँख हवस की तरफ़ देखती है तो दिल उसके नतीजे को देखने से अंधा हो जाता हैं। 
185. إذا رَاَيتَ مَظُلوماً فَاَعِنهُ عَلَى الظّالِمِ; 
जब किसी मज़लूम को देखो तो ज़ालिम के मुक़ाबले में उसकी मदद करो।
186. اِذا رَغِبتَ فِي المَكارِمِ فَاجتَنِبِ المَحارِمَ
अगर बुज़ुर्गी व सम्मान चाहतें हो तो हराम काम से दूर हो जाओ।
187. إذا أكرَمَ اللهُ عَبداً شَغَلَهُ بِمَحَبَّتِهِ
जब अल्लाह किसी बन्दे का आदर करता है तो उसे अपनी मोहब्बत में व्यस्त कर देता है। 
188. إذا عَلَوتَ فَلا تُفَكِّر فِيمَن دُونَكَ مِنَ الجُهّالِ ولكِنِ اقتَدِ بِمَن فَوقَكَ مِنَ العُلَماءِ
जब किसी उच्चता पर पहुंचो तो अपने से नीचे के जाहिलों के बारे में न सोचो, बल्कि अपने से ऊपर वाले आलिमों का अनुसरण करो।
189. إذا رَأيتَ في غَيرِكَ خُلقاً ذَمياً فَتَجَنَّب مِن نَفسِكَ اَمثالَهُ
जब तुम किसी में कोई अख़लाकी बुराई देखो तो स्वयं को उस जैसी बुराईयों से दूर रखो।
190. إذا أرادَ اللهُ بِعَبد خَيراً ألهَمَهُ القَناعَةُ وأصَلَحَ لَه زَوجَهُ
जब अल्लाह किसी बन्दे की भलाई चाहता है तो उसके दिल में क़िनाअत (कम को अधिक समझना) डाल देता है और उसकी बीवी को नेक बना देता है।
191. إذا أرادَ اللهُ سُبحانَهُ صَلاحَ عَبد ألهَمَهُ قِلَّةَ الكَلامِ وَقِلَّةَ الطَّعامِ وَقِلَّةَ المَنامِ
जब अल्लाह किसी बन्दे का सुधार व भलाई चाहता है तो उसके दिल में कम बोलने, कम खाने, कम सोने की बात डाल देता है।
192. اِذا هَمَمتَ بِآمر فَاجتَنِب ذَميمَ العَواقِبِ فِيهِ
जब किसी काम का इरादा करो तो उसके बुरे नतीजे से बचो। 
193. إذا سَأَلتَ فَاسأل تَفَقُّهاً وَلا تَسأَل تَعَنُّتاً
जब कोई सवाल पूछो तो समझने व जानने के लिये पूछो, दूसरों का इम्तेहान लेने के लिये नहीं।
194. إذا كَتَبتَ كِتاباً فَأَعِد فيهِ النَّظَرَ قَبلَ خَتمِهِ فَإنَّما تَختِمُ عَلى عَقِلِكَ
जब तुम कोई चीज़ लिखो तो उस पर मोहर लगाने से पहले उसे एक बार फिर पढ़ कर देख लो क्योंकि तुम अपनी बुद्धी पर मोहर लगा रहे हो।
195. إذا رَغِبتَ في صَلاحِ نَفسِكَ فَعَلَيكَ بِالاِقتِصادِ وَالقُنُوعِ وَالتَّقَلُّلِ; 
अगर स्वयं को सुधारना चाहते हो तो मयानारवी (न कम न अधिक) से खर्च करो, जो मिले उस पर खुश रहो और इच्छाओं को कम कर दो।
196. بِحُسنِ العِشرَةِ تَدوُمُ المَوَدَّةُ; 
अच्छे व्यवहार से मोहब्ब्त मज़बूत होती है।
197. بِالعَدلِ تَتَضاعَفُ البَرَكاتُ; 
इन्साफ से बरकतें दोगुनी हो जाती हैं।
198. بِالدُّعاءِ يُستَدفَعُ البَلاءُ; 
दुआ से, विपत्तियाँ दूर होती हैं।
199. بِحُسنِ الاَخلاقِ يَطيبُ العَيشُ;
अच्छे अखलाक से जीवन आनंन्दायक बनता है। 
200.بِصِحَّةِ المِزاجِ تُوجَدُ لَذَّةُ الطَّعمِ; 
स्वास्थ सही होता है जो खाने के मज़े का एहसास होता है। 

हदीस भाग ३

हदीस भाग ३
हकीम दानिश
हदीसें हदीसें 
तीसरा भाग
101. أكرِم ضَيفَكَ وَإن كانَ حَقيراً وَقُم عَن مَجلِسِكَ لاَِبِيكَ وَمُعَلِّمِكَ وَإن كُنتَ أميراً
अपने मेहमान की इज़्ज़त करो चाहे वह नीच ही हो और अपने बाप व उस्ताद के आदर में अपनी जगह से खड़े हो जाओ चाहे तुम शासक ही क्यों न हो। 
102. اِغتَنِم مَنِ استَقرَضَكَ في حالِ غِناكَ لِيَجعَلَ قَضاءَهُ في يَومِ عُسرَتِكَ;
(अगर) कोई तुम्हारे मालदार होने की स्थिति में तुम से कर्ज़ माँगे तो उसे अच्छा समझो, वह तुम्हारी आवश्यक्ता के समय तुम्हें उसका बदला देगा। 
103. أكثِرِ النَّظرَ إلى مَن فُضِّلتَ عَلَيهِ فَإنَّ ذلِكَ مِن أبوابِ الشُّكرِ
तुम्हें जिन लोगों पर श्रेष्ठता दी गई है उनकी ओर अधिक देखो, (अर्थात उनका अधिक ध्यान रखो) क्योंकि यह, शुक्र करने का एक तरीका है।
104. أشعِر قَلبَكَ الرَّحمَةَ لِجَميعِ النّاسِ وَالإحسانِ إلَيهِمَ وَلا تُنِلهُم حَيفاً وَلا تَكُن عَلَيهِم سَيفاً;
समस्त लोगों के साथ मोहब्बत और भलाई करने को अपने दिल का नारा बना लो और न उन्हें नुक्सान पहुंचाओ और न ही उन पर तलवार खींचो।
105. اِستَفرغ جُهدَكَ لِمَعادِكَ تُصلِح مَثواكَ وَلا تَبع آخِرَتَكَ بِدُنياكَ
अपनी पूरी मेहनत व कोशिश को आख़ेरत के लिये खर्च करो ताकि तुम्हारा ठिकाना अच्छा बने और अपनी आख़ेरत को दुनिया के बदले न बेचो।
106. اِجعَل لِكُلِّ إنسان مِن خَدَمِكَ عَمَلاً تَأخُذهُ بِهِ فَإنَّ ذلِكَ أحرى أن لا يَتَواكَلُوا فِي خِدمَتِكَ; 
अपने तमाम मातहतों को काम पर लगाओ और उनसे, उनके कार्यों के बारे में पूछ ताछ करो, (ताकि वह अपनी ज़िम्मेदारियों का जवाब दें) यह काम (इस लिए) अच्छा है कि वह अपनी ज़िम्मेदारी को एक दूसरे के कांधे पर न डाल सकें।
107. اُبذل لِصَديقِكَ كُلَّ المَوَدَّةِ وَلا تَبذُل لَهُ كُلَّ الطُّمَأنينَةِ وأَعطِهِ مِن نَفسِكَ كُلَّ المُواساةِ وَلا تَقُصَّ اِلَيهِ بِكُلِّ أسرارِكَ; 
अपनी पूरी मोहब्बत को अपने दोस्त पर निछावर कर दो, लेकिन उस पर आँख बन्द कर के भरोसा न करो, दिल से उसके साथ रहो लेकिन अपने सारे राज़ उसे न बताओ। 
108. اِصبِر عَلى مَرارَةِ الحَقِّ وَإيّاكَ أن تَنخَدِعَ لِحَلاوَةِ الباطِلِ; 
हक़ (सच्चाई) की कडवाहट पर सब्र करो और खबरदार बातिल (झूठ) की मिठास से धोखा न खाना।
109. أطِع مَن فَوقَكَ يُطِعكَ مَن دُونَكَ; 
अपने बड़ों का कहना मानों ताकि तुम्हारे छोटे तुम्हारा कहना मानें। 
110. اِكتَسِبُوا العِلمَ يَكسِبكُمُ الحَياةَ; 
ज्ञान प्राप्त करो ताकि वह तुम्हें ज़िन्दगी दें। 
111. اِلزَمُوا الجَماعَةَ وَاجتَنِبُوا الفُرقَةَ; 
सब के साथ मिल कर रहो और अलग रहने से बचो।
112. اِنتَهِزُوا فُصَ الخَيرِ فَإنَّها تَمُرُّ مَرَّ السَّحابِ;
सुअवसर से फ़ायदा उठाओ क्यों कि वह बादलों की तरह गुज़र जाती है। 
113. اِتَّقُوا مَعاصِيَ الخَلَواتِ فَإنَّ الشّاهِدَ هُوَ الحاكِمُ; 
तन्हाई के गुनाहों से बचो, क्योंकि उन्हें देखने वाला हाकिम है।
114. اُطلُبُوا العِلمَ تُعرَفُوا بِهِ وَاعمَلُوا بِه تَكُونُوا مِن أهلِهِ;
ज्ञान प्राप्त करो ताकि उसके द्वारा पहचाने जाओ और उस पर क्रियान्वित रहो ताकि उसके योग्य बने रहो।
115. اِضرِبُوا بَعضَ الرَّأيِ بِبَعض يَتَوَلَّد مِنهُ الصَّوابُ;
अपनी राय को एक दूसरे के सामने रखो ताकि उस से एक अच्छा नतीजा निकले।
116. أجمِلُوا فِي الخِطابِ تَسمَعُوا جَميلَ الجَوابِ; 
अपनी बात चीत को सुन्दर बनाओ ताकि अच्छा जवाब सुनो।
117. اِتَّهِمُوا عُقُولَكُم فَإنَّهُ مِنَ الثِّقَةِ بِها يَكُونُ الخَطاءُ; 
अपनी बुद्धी को ग़लती करने वाली मान कर चलो, क्योंकि उस पर अधिक भरोसा करना ग़लती हो सकती है। 
118. اِحذَر كُلَّ عَمَل يَرضاهُ عامِلُهُ لِنَفسِهِ وَيَكرَهُهُ لِعامَّةِ المُسلِمينَ; 
हर उस काम से बचो जिस का करने वाला उसे अपने लिये तो पसंद करता हो लेकिन आम मुसलमानों के लिये पसंद न करता हो।
119. اِحذَر كُلَّ قَول وَفِعل يُؤدِّي إلى فَسادِ الآخِرَةِ وَالدِّينِ;
हर उस बात व काम से बचो, जो आख़ेरत व दीन को बर्बादी की ओर ले जायें।
120. اِحذَر مُجالَسَةَ قَرينِ السُّوءِ فَإنَّهُ يُهلِكُ مُقارِنَهُ وَيُردي مُصاحِبَهُ; 
बुरे दोस्त के पास बैठने से बचो, क्योंकि वह अपने दोस्त को बर्बाद और अपने साथी को ज़लील करता है।
121. اِحذَرُوا ضِياعَ الأعمارِ فِيما لا يَبقى لَكُم فَفائِتُها لايَعُودُ; 
जो चीज़ें तुम्हारे पास बाक़ी रहने वाली नहीं हैं, उनमें अपनी उम्र बर्बाद करने से बचो, क्योंकि जो उम्र बीत जाती है, वह वापस नहीं आती। 
122. إيّاكَ وَالهَذَرَ فَمَن كَثُرَ كَلامُهُ كَثُرَت آثامُهُ;
अधिक बोलने से बचो क्योंकि अधिक बोलने वाले के गुनाह भी अधिक होते हैं।
123. إيّاكَ وَالنَّميمَةَ فَإنَّها تَزرَعُ الضَّغينَةَ وَتُبَعِّدُ عَنِ اللهِ وَالنّاسِ; 
चुग़ल खोरी से बचो, क्योंकि यह दुश्मनी का बीज बोती है और अल्लाह व इन्सानों से दूर करती है। 
124. إيّاكَ وَالمَنَّ بِالمَعرِّوفِ فَإنَّ الاِمتِنانَ يُكَدِّرُ الإحسانَ; 
भलाई करने के बाद उसका एहसान जताने से बचो, क्योंकि एहसान जताना नेकी को बर्बाद कर देता है। 
125. إيّاكَ وَالنِّفاقَ فَإنَّ ذَا الوَجهَينِ لا يَكُونُ وَجيهاً عِندَ اللهِ; 
निफ़ाक से बचो, क्योंकि अल्लाह (की नज़र में) मुनाफिक की कोई इज़्ज़त नहीं है।
126. إيّاكَ أن تَجعَلَ مَركَبَكَ لِسانَكَ في غِيبَةِ إخوانِكَ أو تَقُولَ ما يَصيرُ عَلَيكَ حُجَّةً وَفِي الإساءَةِ إِلَيكَ عِلَّةً; 
अपनी ज़बान को अपने भाई की चुग़ली की सवारी बनाने से बचओ और ऐसी बात कहने से भी दूर रहो जो तुम्हारे लिये दलील और तुम्हारे साथ बुराई करने का कारण व बहाना बने।
127. إيّاكُم وَالبِطنَةَ فَإنَّها مَقساةٌ لِلقَلبِ مَكسَلَةٌ عَنِ الصَّلاةِ وَمَفسَدَةٌ لِلجَسَدِ; 
पेट भर कर भोजन करने से बचो, क्योंकि इस से दिल सख़्त होता है, नमाज़ में सुस्ती पैदा होती है और यह शरीर के लिये भी हानिकारक है।
128. إيّاكُمِ وَالفُرقَةَ فَإنَّ الشّاذَّ عَن أهلِ الحَقِّ لِلشَّيطانِ كَما أنَّ الشّاذَّ مِنَ الغَنَمِ لِلذِّئبِ; 
अलग होने से बचो, क्योंकि हक़ से अलग होने वाला शैतान का (शिकार बन जाता है) जिस तरह रेवड़ से अलग होने वाली भेड़, भेड़िये का शिकार बन जाती है।
129. ألا مُستَيقِظٌ مِن غَفلَتِهِ قَبلَ نَفادِ مُدَّتِهِ; 
क्या कोई नहीं है, जो उम्र पूरी होने से पहले ग़फ़लत से जाग जाए।
130. ألا وَإنَّ مِنَ البَلاءِ الفاقَةَ وَأشَدُّ مِنَ الفاقَةِ مَرَضُ البَدَنِ وَأشَدُّ مِن مَرَضِ البَدَنِ مَرَضُ القَلبِ; 
जान लो कि भुखमरी एक विपत्ति है और शारीरिक बीमारी भुखमरी से भयंकर है और दिल की बीमारी (अर्थात कुफ़्र, निफ़ाक़ व शिर्क) शारीरिक बीमारी से भी भंयकर है।
131. ألا لايَستَحيِيَنَّ مَن لا يَعلَمُ أن يَتَعَلَّمَ فَإنَّ قِيمَةَ كُلِّ امرِئ مَا يَعلَمُ; 
समझ लो कि तुम जिस चीज़ के बारे में नहीं जानते हो उसे सीखने में शर्म न करो, क्योंकि हर इन्सान का महत्व उस चीज़ में है जिसे वह जानता है।
132. ألا لا يَستَقبِحَنَّ مَن سُئِلَ عَمَا لا يَعلَمُ أن يَقُولَ لا أعلَمُ;
जान लो कि जब किसी से कोई सवाल पूछा जाये और वह उसका जवाब न जानता हो तो यह कहने में कोई बुराई नही है कि मैं नहीं जानता हूँ।
133. أفضَلُ العِبادَةِ غَلَبَةُ العادَةِ; 
सब से अच्छी इबादत आदतों पर क़ाबू पाना है। 
134. أفضَلُ الإِيمانِ الأمانَةُ;
सब से अच्छा ईमान आमानतदारी है।
135. اَسوَءُ النّاسِ عَيشاً الحَسُودُ; 
इंसानों में सब से बुरा जीवन ईर्ष्यालु का होता है।
136. أَشَدُّ القُلُوبِ غِلاًّ قَلبُ الحَقُودِ; 
दिलों में सब से बुरा दिल, कीनः (ईर्ष्या) रखने वाले का होता है। 
137. أَفضَلُ العَمَلِ ما اُرِيدَ بِهِ وَجهُ اللهِ; 
सब से अच्छा काम वह है जिस के द्वारा अल्लाह की ख़ुशी को प्राप्त करने की इच्छा की जाये। 
138. أَفضَلُ المَعرُوفِ إغاثَةُ المَلهُوفِ;
सब से श्रेष्ठ भलाई, पीड़ित की फ़रियाद सुनना है।
139. أَكبَرُ الحُمقِ الإغراقُ فِي المَدحِ وَالذَّمِ; 
सब से बड़ी मूर्खता, (किसी की) बुराई या प्रशंसा में अधिक्ता से काम लेना है।
140. أَفضَلُ النّاسِ أنفَعُهُمِ لِلنّاسِ;
सब से अच्छा इन्सान वह है, जिस से इन्सानों को सबसे अधिक फ़ायदा पहुंचता है। 
141. أَقبَحُ الغَدرِ إذاغَةُ السِّرِّ; 
सब से बड़ी गद्दारी (किसी के) रहस्यों को खोलना है।
142. أَفضَلُ الوَرَعِ حُسنُ الظَّنِّ;
सब से अच्छी पारसाई, खुश गुमान रहना है। 
143. أَسرَعُ شَيء عُقُوبَةً اليَمينُ الفاجِرَةُ; 
जिस चीज़ की सज़ा बहुत जल्दी मिलती है, वह झूठी क़सम है।
144. أَكثَرُ النّاسِ أمَلأ أقَلُّهُم لِلمَوتِ ذِكراً; 
सब से अधिक इच्छायें उन लोगों की होती है, जो मौत को बहुत कम याद करते हैं।
145. أَبصَرُ النّاسِ مَن أبصَرَ عُيُوبَهُ وَأقلَعَ عَن ذُنُوبِهِ;
सब से अधिक दृष्टिवान इन्सान वह है जो अपनी बुराइयों को देखे और गुनाहों से रुक जाये।
146. أَقوَى النّاسِ مَن غَلَبَ هَواهُ;
सब से अधिक शक्तिशाली इन्सान वह है जो अपनी हवस पर काबू पा ले।
147. أَصلُ المُرُوءَةِ الحَياءُ وَثَمَرَتُهَا العِفَّةُ; 
मर्दांगी की जड़ शर्म है, और उसका फल पारसाई है।
148. أَفضَلُ النّاسِ مَن كَظَمَ غَيظَهُ وَحَلُمَ عَن قُدرَة; 
सब से अच्छा इन्सान वह है जो अपने गुस्से को पी जाए और ताक़त के होते हुए संयम से काम ले।
149. أَغبَطُ النّاسِ المُسارِعُ إلَى الخَيراتِ
सब से खुश हाल इन्सान वह है जो नेकियों की तरफ़ दौड़े।
150. أَعظَمُ الذُّنُوبِ عِندَ اللهِ ذَنبٌ اَصَرَّ عَلَيهِ عامِلُهُ; 
अल्लाह के नज़दीक सब से बड़ा गुनाह वह है, जिसे गुनहगार बार बार करे।

हदीस भाग २

हदीस भाग २
हकीम दानिश
हदीसें हदीसें 
दूसरा भाग
51. ;اَلفِكرُ فِي الخَيرِ يَدعُو إلَى العَمَلِ بِهِ
नेकी के बारे में सोचना, (आदमी को) नेकी करने का निमन्त्रण देता है।
52. ;اَلتَّدبِيرُ قَبلَ العَمَلِ يُؤمِنُ النَّدَمَ
काम से पहले सोच विचार करना, लज्जा से बचाता है।
53.اَلتَّقريعُ اَشَدُّ مِن مَضَضِ الضَّربِ
निंदा झेलना, मार पीट के दर्द से भी बुरा है।
54.اَلمُؤمِنُ هَيِّنٌ لَيِّنٌ سَهلٌ مُؤتَمَنٌ
मोमिन, सरल स्वभावी, विनम्र, आसानी से काम लेने वाला और भरोसेमंद होता है।
55. ;اَلمُؤمِنُ سِيرَتُهُ القَصدُ وَسُنَّتُهُ الرُّشدُ 
मोमिन की जीवन शैली, समस्त कामों में बीच का रास्ता अपनाना और उसकी सुन्नत विकास करना है।
56. اَلبِشرُ اِسداءُ الصَّنيعَةِ بغیر مَؤُونَةِ; 
प्रफुलता, बगैर खर्च की नेकी है।
57. اَلطُّمَأنينَةُ قَبلَ الخُبرَةِ خِلافُ الحَزمِ
परीक्षा किये बिना, किसी पर भरोसा करना दूर दर्शिता के ख़िलाफ है।
58. اَلإحسانُ اِلَى المُسيءِ يَستَصلِحُ العَدُوَّ; 
बुरे के साथ भलाई करना, दुश्मन का सुधार करना है।
59. اَلحَياءُ مِنَ اللهِ يَمحوُ كثيراً مِنَ الخَطايا; 
अल्लाह से शर्माना, बहुत से गुनाहों को मिटा देता है।
60. اَلصِّدقُ مُطابَقَةُ المَنطِقِ لِلوَضعِ الإلهِيِّ; 
सच बोलना, उस बात के अनुसार है जो अल्लाह ने (प्रत्येक व्यक्ति के अस्तित्व में) रखी है।
61. اَلمُرائي ظاهِرُهُ جَميلٌ وَباطِنُهُ عَليلٌ
पाखंड़ी (दिखावा करने वाले) का बाह्य रूप अच्छा और आन्तरिक रूप बुरा होता है। 
62. اَلمَطَلُ وَالمَنُّ مُنَكِّدَ الإحسانِ
एहसान जताना, नेकी की महत्ता को कम कर देता है। 
63. اَلدُّعاءُ لِلسّائِلِ إحدَى الصَّدَقَتَينِ
ज़रुरतमंद के लिये दुआ करना, दो सदकों में से एक है। 
64. اَلإنصافُ يَرفَعُ الخِلافَ وَيُوجِبُ الاِئتِلافَ
इंसाफ लड़ाई झगड़ों को खत्म कर देता है और मोहब्बत बढ़ाता है। 
65. اَلصَّبرُ عَلى طاعَةِ اللهِ أهوَنُ مِنَ الصَّبرِ عَلى عُقُوبَتِهِ
अल्लाह की आज्ञा पालन पर सब्र करना, उसकी सज़ा पर सब्र करने से आसान है। 
66. اَلعالِمُ مَن لا يَشبَعُ مِنَ العِلمِ وَلا يَتَشَبَعُ بِهِ
ज्ञानी कभी ज्ञान से तृप्त नही होता और न ही अपनी तृप्तता को प्रकट करता। 
67. اَلكَمالُ فِي ثَلاث: اَلصَبرُ عَلَى النَّوائِبِ وَالتَوَرُّعُ فِي المَطالِبِ وَإسعافُ الطّالِبِ
(इन्सान का) कमाल तीन चीज़ों में है, परेशानियों पर सब्र करना, इच्छाओं के होते हुए पारसा बने रहना, और माँगने वाले की आवश्यक्ता को पूरा करना। 
68. اَلعارِفُ مَن عَرَفَ نَفسَهُ فَأَعتَقَها وَنَزَّهَها عَن كُلِّ ما يُبَعِّدُها وَيُوبِقُها
आरिफ (ब्रह्मज्ञानी) वह है जो स्वयं को पहचाने और स्वयं को हर उस चीज़ से बचाये रखे जो उसे सही रास्ते से दूर करे और विनाश की ओर ले जाए। 
69. اَلإخوانُ فِي اللهِ تَعالى تَدُومُ مَوَدَّتُهُم لِدَوامِ سَبَبِها
जो किसी को अल्लाह के लिए भाई बनाता है उसकी मोहब्बत स्थाई हो जाती है, क्यों कि दोस्ती व भाई चारे का कारण अमर है। 
70. اَلكُيِّسُ مَن كانَ يَومُهُ خَيراً مِن أمسِهِ وَعَقَلَ الذَّمَّ عَن نَفسِهِ; 
चतुर वह है, जिस का आज, बीते हुए कल से अच्छा हो और जो स्वयं को बुराइयों से रोक ले।
71. اَلتَّقَرُّبُ إلَى اللهِ تَعالى بِمَسأَلَتِهِ وَإِلَى النّاسِ بِتَركِها 
अल्लाह का समीपयः उस से कुछ माँगने पर प्राप्त होता है और इंसानों का समीपयः उनसे कुछ न माँगने पर।
72. إخوانُ الصِّدقِ زِينَة ٌفی السراء وعدۃ فی الضراء; 
सच्चा भाई खुशी में शोभा होता है और दुख दर्द में (सहायता के लिए हर तरह से) तैयार रहता है।
73. اَلمُرُؤَةُ اجتِنابُ الرَّجُلِ ما يَشينُهُ وَاكتِسابُهُ ما يَزينُهُ; 
मर्दानंगी इसमें है कि मर्द उन चीज़ों से दूर रहे जो उसे बुरा बनायें और उन चीज़ों को अपनाये जो उसे शौभनीय बनायें।
74. اَلحاسِدُ يَرى أنَّ زَوالَ النِّعمَةِ عَمَّن يَحسُدُهُ نِعمَةٌ عَلَيهِ; 
ईर्ष्यालु जिस से ईर्ष्या करता है, उसकी नेमतों के विनाश को अपने लिये नेमत (धन दौलत) समझता है।
75. اَلعامِلُ بِجَهل كَالسَّائِرِ عَلى غَيرِ طَريق فَلا يَزيدُهُ جِدُّهُ فِي السَّيرِ إلاّ بُعداً عَن حاجَتِهِ
अज्ञानता के साथ किसी काम को करने वाला, ग़लत रास्ते पर चलने वाले की तरह है, उसकी आगे बढ़ने की कोशिश से गंतव्य से दूर होने के अलावा उसे कोई फायदा नहीं होता। 
76. الذُّنُوبُ الدّاءُ وَالدَّواءُ الاِستِغفارُ وَالشَّفاءُ أن لا تَعُودَ
गुनाह, दर्द है और उसकी दवा इस्तगफार (अल्लाह से क्षमा याचना करना) है और उसका इलाज उसे न दोहराना है। 
77. اَلصَّبرُ صَبرانِ: صَبرٌ عَلى ما تَكَرَهُ وَصَبرٌ عَمّا تُحِبُّ
सब्र दो तरह के हैं : एक वह सब्र जो उन चीज़ों पर करते हों जिन्हें अच्छा नहीं समझते हो और दूसरा वह सब्र जो उन चीज़ों पर करते हों जो तुम्हें अच्छी लगती हो। 
78. إكمالُ المَعرُوفِ أحسَنُ مِنِ ابتِدائِهِ
नेकियों को पूरा करना, उनको शुरु करने से भी अच्छा है। 
79. اَلصَّديقُ الصَّدوُقُ مَن نَصَحَكَ فِي عَيبِكَ وَحَفِظَكَ فِي غَيبِكَ وَآثَرَكَ عَلى نَفسِهِ
तुम्हारा सच्चा दोस्त वह है जो तुम्हें तुम्हारी बुराइयों के बारे में नसीहत करे, तुम्हारे पीछे तुम्हारी रक्षा करे और तुम्हें अपने ऊपर वरीयता दे। 
80. اَلحَزمُ النَّظَرُ فِي العَواقِبِ ومُشاوَرَةُ ذَوِي العُقُولِ
दूर दर्शिता, (किसी काम के) परिणामों पर ग़ौर करना और बुद्धिमान लोगों से परामर्श करने का नाम है। 
81. اَلدَّهرُ يَومانِ: يَومٌ لَكَ وَيَومٌ عَلَيكَ فَإذا كانَ لَكَ فَلا تَبطَر وَإذا كانَ عَلَيكَ فَاصطَبِر
दुनिया दो दिन की है, एक दिन तुम्हारे पक्ष में और दूसरा तुम्हारे विरुद्ध है, जब तुम्हारे पक्ष में हो तो उपद्रव न करो और जब तुम्हारे विरुद्ध हो तो सब्र से काम लो। 
82. اَلعِلمُ خَيرٌ مِنَ المالِ، اَلعِلمُ يَحرُسُكَ وَأنتَ تَحرُسُ المالَ
ज्ञान, माल से अच्छा है, क्यों कि ज्ञान तुम्हारी रक्षा करता है और माल की तुम रक्षा करते हो। 
83. اَلتَّثَبُّتُ خَيرٌ مِنَ العَجَلَةِ إلاّ فِي فُرَصِ البِرِّ
सुअवसर के अतिरिक्त (कार्यों में) देर करना, जल्दी करने से अच्छा है, 
84. اَلجُنُودُ عِزُّ الدِّينِ وَحُصُونُ الوُلاةِ
फौज, दीन के लिए इज़्ज़त और शासकों के लिए किला है। 
85. اَلأمرُ بِالمَعروفِ أفضَلُ أعمالِ الخَلقِ
अम्र बिल मअरुफ (इंसानों को अच्छे काम करने की सलाह देना), लोगों का सब से अच्छा काम है। 
86. اَلطُّمَأنِينَةُ اِلى كُلِّ أحَد قَبلَ الاِختِبارِ مِن قُصُورِ العَقلِ
परीक्षा करने से पहले, हर एक पर भरोसा करना कम बुद्धी की निशानी है। 
87. اَلبُكاءُ مِن خَشَيَةِ اللهِ يُنيرُ القَلبَ وَيَعصِمُ مِن مُعاوَدَةِ الذَّنبِ
अल्लाह से डर कर रोना, दिल को प्रकाशित करता है और गुनाह की पुनरावर्त्ति से रोकता है। 
88. اَلحِدَّةُ ضَربٌ مِنَ الجُنُونِ لأَنَّ صاحِبَها يَندَمُ فَإن لَمِ يَندَم فَجُنونُهُ مُستَحكَمٌ
क्रूरता, एक तरह का पागलपन है, क्योंकि ऐसा करने वाला लज्जित होता है और अगर वह लज्जित न हो तो उसका पागल पन पक्का है। 
89. اَلأيّامُ صَحائِفُ آجالِكُم، فَخَلِّدُوها أحسَنَ أعمالِكُم
हर दिन तुम्हारी उम्र का रजिस्टर है अतः उन्हें अपने अच्छे कामों से अमर बनाओ। 
90. اَلتَّيَقُّظُ فِي الدِّينِ نِعمَةٌ عَلى مَن رُزِقَهُ
धार्मिक जागरूकता, एक ऐसी नेमत है जो नसीब से मिलती है। 
91. اَلمُتَعَبِّدُ بِغَيِر عِلم كَحِمار الطّاحُونَةِ، يَدُورُ وَلا يَبرَحُ مِن مَكانِهِ
ज्ञान के बिना इबादत करने वाला, उस चक्की चलाने वाले गधे के समान है जो घूमता रहता है लेकिन अपनी जगह से बाहर नहीं निकलता। 
92. اَلكَريمُ مَن صانَ عِرضَهُ بِمالِهِ وَاللَّئيمُ مَن صانَ مالَهُ بِعِرضِهِ
करीम (महान) वह है जो अपनी इज़्ज़त को माल से बचाता है और नीच वह है जो इज़्ज़त खो कर माल बचाता है। 
93. اَلصَّلاةُ حِصنُ مِن سَطَواتِ الشَّيطانِ
नमाज़ शैतान के हमलों (से बचने के लिए) किला है। 
94. اِنسَ رِفدَكَ اُذكُر وَعدَك
दी हुई चीज़ों को भूल जाओं और अपने वादों को याद करो। 
95. أعِن أخاكَ عَلى هِدايَتِهِ
(नेकी के) मार्गदर्शन में अपने भाई की मदद करो। 
96. أحسِن إلى مَن أساءَ إِلَيكَ وَاعفُ عَمَّن جَنى عَلَيكَ
जिसने तुम्हारे साथ बुराई की उसके साथ भलाई करो और जिसने तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार किया उसे क्षमा कर दो।
97. أصلِحِ المُسيءَ بِحُسنِ فِعالِكَ وَدُلَّ عَلَى الخَيرِ بِجَميلِ مَقالِكَ
बुरे इन्सान को अपने अच्छे व्यवहार से सुधारो और अपनी अच्छी बातों के द्वारा उसका नेकी की ओर मार्गदर्शन करो। 
98. اِحفَظ أمرَكَ وَلا تُنكِح خاطِباً سِرَّكَ
अपने कार्यों को छुपाओ और अपने राज़ों को हर चाहने वाले की दुल्हन न बनाओ। अर्थात हर किसी से अपने रहस्यों का वर्णन न करो। 
99. اِرضَ لِلنّاسِ بِما تَرضاهُ لِنَفسِكَ تَكُن مُسلِماً
जो अपने लिये पसन्द करते हो, वही दूसरों के लिये भी पसंद करो, ताकि मुसलमान रहो। 
100. اِرضَ مِنَ الرِّزقِ بِما قُسِمَ لَكَ تَعِش غَنِيّاً;
जो धन तुम्हारे हिस्से में आया है उस पर खुश रहो (और) मालदारी में जीवन व्यतीत करो। 

हदीस

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पहला भाग
1. اَلدُّنيا أمَدٌ، الآخِرَةُ أبَدٌ; 
दुनिया ख़त्म होने वाली है और आख़िरत हमेशा बाक़ी रहने वाली है।
2. اَلتَّواضُعُ يَرفَعُ، اَلتَّكبُّرُ يَضَعُ ; 
(दूसरों के) आदर व सत्कार की भावना, (इंसान को) उच्चता प्रदान करती है और घमंड मिट्टी में मिला देता है।
3. اَلظَّفَرُ بِالحَزمِ وَالحَزِمُ بِالتَّجارِبِ
सफलता दूर दर्शिता से और दूर दर्शिता तजुर्बे से प्राप्त होती है। 
4. اَلحازِمُ يَقظانُ، اَلغافِلُ وَسنانُ
दूर दर्शी जागा हुआ है और ग़ाफिल नींद के प्रथम चरण में है। 
5. اَلعِلمُ يُنجيكَ، الجَهلُ يُرديكَ;
ज्ञान आपको बचाता है और ज्ञानता आपका विनाश करती है। 
6.اَلعَفوُ أحسَنُ الإحسانِ
क्षमा, सब से अच्छी नेकी व भलाई है। 
7. اَلإنسانُ عَبدُ الإحسانِ
इन्सान एहसान का गुलाम है। 
8. اَللَّهوُ مِن ثِمارِ الجَهلِ;
व्यर्थ कार्य मूर्खता का परिणाम होते हैं।
9. اَلسَّخاءُ يَزرَعُ المَحَبَّةَ;
सख़ावत (दान) मोहब्बत के बीज बोती है। 
10. اَلهَدِيَّةُ تَجلِبُ المَحَبَّةَ
उपहार मोहब्बत को अपनी तरफ़ खींचता है।
11. اَلمَواعِظُ حَياةُ القُلُوبِ
नसीहत (सद उपदेश) दिलों की ज़िन्दगी है।
12. اَلعُجبُ رَأسُ الحَماقَةِ
घमंड, मूर्खता की जड़ है।
13. أخُوكَ مُواسِيَكَ فِي الشِّدَّ
तुम्हारा भाई वह है जो मुशकिल के समय जान व माल से तुम्हारी सहायता करे।
14. اَلعَجَلُ يُوجِبُ العِثارَ
जल्दी, गल्तियों का कारण बनती है।
15. اَلمَرءُ ابنُ ساعَتِهِ
आदमी अपने समय की संतान है। 
16. اَلحازِمُ مَن دارى زَمانَهُ
दूर दर्शी वह है जो अपने समय से प्यार करे।
17.اَلمطامِعُ تُذِلُّ الرِّجالَ
लालच मर्दों को ज़लील करा देता है। 
18. اَلمَنُّ يُفِسدُ الإحسانَ
एहसान जताना, नेकियों को बर्बाद कर देता है। 
19. لطَّيشُ يُنَكِّدُ العَيشَ; 
"मूर्खता, जीवन को कठिन बना देती है।
20. اَلاِعتِبارُ يُثمِرُ العِصمَةَ
(विभिन्न घटनाओं से) शिक्षा लेना, (गुनाहों से) सुरक्षित रहने का परिणाम है।
21. اَلنَّدمُ عَلَى الخَطيئَةِ يَمحُوها
(अपनी) ग़लती पर लज्जित होना, गलतियों को ख़त्म कर देता है।
22. اَلغيبَةُ آيَةُ المُنافِقِ;
चुग़ली, मुनाफ़िक़ की पहचान है।
23. اَلقَناعَةُ أهنَأُ عَيش;
क़िनाअत (कम पर खुश रहना), सब से अच्छी ज़िन्दगी है।
24. اَلعُيُونُ مَصائِدُ الشَّيطانِ;
आँखें, शैतान का जाल हैं।
25. اَلمَرءُ مَخبُوءٌ تَحتَ لِسانِهِ;
आदमी अपनी ज़बान के पीछे छिपा होता है। 
26. اَلمَرءُ لا يَصحَبُهُ إلاَّ العَمَلُ;
आदमी का उसके कार्यों के अलावा कोई साथी नहीं होता। 
27. اَلحَسُودُ لا يَسُودُ;
ईर्ष्यालू को कोई फायदा नहीं होता। 
28. اَلاِستِشارَةُ عَينُ الهِدايَةِ;
मशवरा करना, मार्गदर्शन का स्रोत है।
29. اَلبَشاشَةُ حِبالَةُ المَوَدَّةِ
प्रफुलता, मोहब्बत का जाल है। 
30. إضاعَةُ الفُرصَةِ غُصَّةٌ;
फ़ुर्सत को खो देना, दुख का कारण बनता है। 
31. اَلحَليمُ مَنِ احتَمَلَ إخوانَهُ
संयमी वह है जो अपने भाईयों की (गलतियों को) बर्दाश्त करले। 
32. اَلكِبرُ مِصيَدةُ إبليسِ العُظمى
घमंड, शैतान का सब से बड़ा जाल है।
33. اَلمُحسِنُ مَن صَدَّقَ أقوالَهُ أفعالُهُ
नेक वह है, जिसके काम, उसकी बात को सत्यापित करें।
34. إظهارُ التَّباؤُسِ يَجلِبُ الفَقرَ
परेशानियों को ज़ाहिर करना, फ़क़ीरी लाता है। 
35. اَلمُعينُ عَلَى الطّاعَةِ خَيرُ الأصحابِ
सब से अच्छे साथी वह हैं जो (अल्लाह की) आज्ञा पालन में मदद करें।
36. اَلغِنى وَالفَقرُ يَكشِفانِ جَواهِرَ الرِّجالِ وَأوصافَها;
समृद्धता और निर्धनता, दोनों ही मर्दों के जौहरों और विशेषताओं को प्रकट कर देती हैं। 
37. اَلسُّكُوتُ عَلَى الأحمَقِ أفضَلُ جَوابِهِ
जाहिल के सामने चुप हो जाना उसका सब से अच्छा जवाब है।
38. اَلسّامِعُ لِلغيبَةِ كَالمُغتابِ
चुग़ली सुनने वाला, चुग़ली करने वाले के समान है। 
39. اَلجَمالُ الظّاهِرُ حُسنُ الصُّورَةِ، اَلجَمالُ الباطِنُ حُسنُ السَّريرَةِ;
बाह्य ख़ूबसूरती अच्छी शक्ल में और आन्तरिक ख़ूब सूरती अच्छे व्यक्तित्व में निहित है। 
40. آلَةُ الرِّیاسَةِ سِعَةُ الصَّدرِ
सत्ता का यन्त्र, सीने का बड़ा होना है, अर्थात जो सबको अपने सीने से लगाता है, वही सत्ता पाता है। 
41. أوَّلُ العِبادَةِ اِنتِظارُ الفَرَج بِالصَّبرِ
सब्र के साथ आराम मिलने का इन्तेज़ार करना, सब से अच्छी इबादत है।
42. اَلبُخلُ بِالمَوجُودِ سُوءُ الظَّنِّ بِالمَعبودِ
मौजूद चीज़ के बारे में कंजूसी करना, माबूद पर बद गुमानी करना है। 
43. اَلغِشُ مِن أخلاقِ اللِّئامِ
धोखेबाज़ी, नीच लोगों का व्यवहार है।
44. َالأيّامُ تُوضِحُ السَّرائِرَ الكامِنَةَ
समय, छुपे हुए भेदों को खोल देता है। 
45. اَلعَجَلُ قَبلَ الإمكانِ يُوجِبُ الغُصَّةَ
(किसी काम को करने के लिए उसके) साधनों (की छान बीन करने) से पहले (उसमें) जल्दी करना, दुख का कारण बनता है। 
46. اَلتَّوَدُّدُ إلَى النّاسِ رَأسُ العَقلِ;
लोगों से मोहब्बत करना, अक्लमंदी की जड़ है। 
47. اَلمُجاهِدُونَ تُفتَحُ لَهُم أبوابُ السَّما
मुजाहिदों (धर्मयोधाओं) के लिये आसमान के दरवाज़े खोल दिये जाते हैं। 
48. اَلتَّوبَةُ تُطَهِّرُ القُلُوبَ وَتَغسِلُ الذُّنُوبَ
तौबा, दिलों को पाक करती है और गुनाहों को धो डालती है।
49. الَغضَبُ يُفسِدُ الألبابَ وَيُبعِدُ مِنَ الصَّوابِ; 
ग़ुस्सा, अक्ल को खराब और (इंसान को) सही रास्ते से दूर करता है।
50. إدمانُ الشَّبَعِ يُورِثُ أنواعَ الوَجَعِ
हर वक्त पेट का भरा रहना, तरह तरह के दुखों को जन्म देता है।