Friday, August 28, 2015
Saturday, August 15, 2015
नवाब राव मोहम्मद अली खां के बारे में
👉 जरूर पढ़े शान-ऐ-राजपूत 👈
💪नवाब राव मोहम्मद अली खां💪
ये उस मुसलमान राजपूत का नाम है जो कही और के नहीं बल्कि आपके राज्य उत्तराखंड शहीद है हरिद्वार जिले के भगवानपुर क्षेत्र के गाव सिकरोडा के रहने वाले थे जो इस देश के लिए शहीद तो गए पर आज उनका नाम कही इतिहास मे कही नहीं है कभी किसी सरकार को इनकी याद नहीं आई पर पुरे गाव के लोगो और क्षेत्र के लोगो के दिल मे❤ बसे है
"नवाब राव मुहम्मद अली खां"❤
ये वो नाम था जिसे सुनकर अंग्रेज़ो की रुह काँप जाया करती थी इस इलाके मे आने की कभी अंग्रेजी👮 हुकूमत की हिम्मत नहीं हुई 👮 मै राव कामरान आपको बारे अवगत कराना चाहता हूँ
"सन् 1880 मे अंग्रेज़ो के जनरल ग्राम सिकरोडा मे आये 👮 उन्होंने राव साहब के बहादुरी के किस्से सुने थे तो वो राव साहब से मिलने आये और उन्होंने हवेली पर झंडा लगा देखा 🇮🇳 उन्हें राव साहब की देशभगति का अंदाज़ा हो गया था
हवेली पर भोजन करने के बाद जनरल ने कहाँ राव साहब हम आपकी ताकत देखना चाहते है आपका क्षेत्र मे क्या मकाम है
तो राव साहब ने फरमाया अगर मे इस हवेली की छत पर चढ़कर या अपने घुड़सवारो को भेजकर इलाके की जनता को बुलाओ तो लाखो आदमी इकठ्ठा कर सकता हूँ
तब अंग्रेज़ो को राव साहब की ताकत का अंदाज़ा हुआ 💪💪
वहा से जाने के बाद उन्होंने राव साहब के कत्ल की साजिश रजी🔪
कुछ दिन दिल्ली से अग्रेज़ी हुकूमत का फरमान आया 🐴 राव साहब आपको दिल्ली शाही दावत पर बुलाया है जनरल साहब ने अगले दिन राव साहब निकल पड़े🐴
वाह बुलाकर उनके धोखे से मार दिया गया और उनकी लाश को हज़ारो अंग्रेजी सैनिक लेकर आये
पर क्षेत्र को सैनिको ने घेरे रखा कही राव साहब की लाश देखकर लोगो मे विद्रोह ना पैदा हो जाए 🔥🔥
उनकी लाश को ताबूत मे दफना दिया गया और कब्र पर सैनको का पहरा रहा परिवार के लोगो को छुपना पड़ा था और ये वही गाव है जहाँ आज़ादी के वक़्त क्षेत्र के लोगो ने आकर अपनी जान बचाई थी
आज भी वो उस शहीद की यादे और इसका किला यहाँ मौजूद है और अफ़सोस इस देश मे मुसलमानो को आतंकवादी कहा जाता है हर दहाड़ी-टोपी वाले को गलत नज़र से देखा जाता है क्या इसी दिन के लिए शहीद हुए थे "नवाब राव मुहम्मद अली खां"
👆👆"आज 15 अगस्त 2015 के अमर उजाला अखबार मे उस योद्धा के बारे मे छपा है ऊपर आप सब पढ़ सकते है"👆👆
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राव कामरान भाई की की कलम से
जय हिन्द जय भारत
Monday, July 27, 2015
डॉक्टर अवुल पकिर जैनुलाब्दीन (एपीजे) अब्दुल कलाम साहब के इंतेक़ाल कर जाने पर उनको सलाम
डॉक्टर अवुल पकिर जैनुलाब्दीन (एपीजे )अब्दुल कलाम साहब के आज दुनिया से रुखसती पर तहे दिल से उनको सलाम
इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिउन
अल्लाह अपने मेहबूब हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के सदका ऐ तुफैल
उनकी मगफिरत फ़रमाकर जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुकाम अता करे
आमीन सुम्मा आमीन
ये चंद अशआर। कलाम साहब के लिए। मेरी तरफ से।
जो कोई न कर सका वो तुमने काम कर दिया ,
बना कर मिसाइल रोशन देश में नाम कर दिया।
बख्शी खुदा ने तुमको वो हिम्मत वो अक़्ल दी
अब्दुल कलाम नाम की रौनक वो शक्ल दी
बन गए मिसाइल मेंन देश को बचाने के लिए,
अपने फ़र्ज़ अदा किया वतन को सजाने ले लिए।
देश गरीब हो गया कोहिनूर जैसा हीरा खोने से।
बड़ी कमी मेहसूस होगी कलाम साहब के न होने से।
तुम आइडिअल हो सब तुम्हे याद रखेंगे,
कुछ सीखने के लिए तुम्हारी बात कहेंगे।
दौरे ज़ाहिरी में जो किया देश के लिए काम ,
बच्चा बच्चा जानता है तुम्हारा पूरा नाम।
तुम तो वो हो जो हमेशा हँसते हो,
हम जैसो की हमेशा सांसो में बसते हो।
बख्शेगा खुदा तुमको तुम जन्नत में जाओगे।
खुदा ने चाहा तुम शहीद हो आला मुकाम पाओगे।
अब वक्त ऐ रुखसती है। तुम्हे जाना ही पढ़ेगा ,
जो दस्तूर है दुनिया का वो निभाना ही पढ़ेगा।
अलविदा मिसाइल मैन
हकीम दानिश
Friday, July 24, 2015
शोशल मिडिया का एक सच। जो अक्सर लोगो के सामने आता है।
आज का पोस्ट एक ऐसे मुद्दे पर है। जो अक्सर लोगो के सामने आता है। तो आइये सुनिये वो मुद्दा
क्या है। मुद्दा है। एक इंसान का दूसरे इंसान पे यक़ीन करना।
सबसे पहले एक कहानी सुनिए। आप वही पहुच जायेंगे जहा पहुचाना चाहता हु।
सुनिए एक गांव में एक राज मिस्त्री था। उसी गांव में एक और आदमी भी था। जो बिलकुल नकारा था। वो किसी की भी बात पे यकीन नही करता था। चाहे कोई कुछ भी कहे उसे यकीन नही आता था। वो बस दिन भर गांव में बैठा रहता था और सुबह शाम काम पर से आने वालो को देखकर। बेकार की बाते करता था। एक बार वो राज मिस्त्री उस नकारा आदमी को शहर ले गया। और उसे एक 20 मंज़िल की ईमारत दिखाई। उस के अंदर ले गया। कुछ सामान रह गया था वो लेने गया था वापसी में वो राज मिस्त्री ने कहा वो ईमारत कैसी लगी। उसने कहा बहुत अच्छी एक दम लाजवाब राज मिस्त्री बोला ये मैंने बनायीं है। पहले तो उस नकारा ने काफी देर उस मिस्त्री का मुह देखा फिर उस से बोला अबे अपनी शक्ल देखी है आईने में तू और इतनी खूबसूरत ईमारत बनाये। तेरे वस की नहीं है। ज्यादा लंबी लंबी न छोड़। मिस्त्री उसे जब भी शहर ले कर जाता और हर वार नयी नयी इमारते दिखाता और कहता ये मैने बनायीं है। ये मैंने बनाई है। पर उसे कभी यकीन न आया। तो फिर उस मिस्त्री ने कहा चल अबकी बार जब बनाऊंगा तो तू मेरे साथ रहना फिर देखना। उस ने कहा ठीक है। कुछ दिन बाद मिस्त्री को एक और ईमारत बनाने का काम मिला। अब मिस्त्री उस नकारा को साथ ले जाने लगा एक दो मंज़िल तैयार करने के बाद इस नकारा की तबियत खराब हो गयी जिस्की वजह से वो मिस्त्री के साथ नहीं आ सका पर मिस्त्री को तो काम करना ही था वी करता रहा और कुछ वक्त में ही उसने वो ईमारत तैयार कर दी। जब वो नकारा सही हुआ तो मिस्त्री उसे शहर ले कर आया। और वही ईमारत दिखाई जो इस बार उसने बनाई थी। और कहा ये देख तेरे जाने के बाद ये बनाई है। वो तो नकारा था। उसने फिर उसे झुठला दिया। के नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता।
तू और ऐसी ईमारत बनाये अबे जा अभी तू बच्चा है। जब में नहीं था हो सकता है। मेरे जाने के बाद इस ईमारत के मालिक ने कही से ये बनी बनाई खरीदी होगी। बहुत समझाया पर वो नहीं माना। आखिर कार उस मिस्त्री को यही कहना पढ़ा के हा भाई चल तू जीता में हारा ये उस मालिक ने कही से खरीदी है बस। उसने कहा हा देखा न अब आया लाइन पे।
।।।
यहाँ तक पहुचने के लिए शुक्रिया। अब इस पोस्ट के असल मुद्दे पर आता हु। इस पोस्ट का मकसद था। के वो हक़ीक़त दिखाना जो यहाँ शोशल साइट्स पर अक्सर लोग नहीं जानते और वो लोग पोस्ट लिखने वालो पे यकींन नहीं करते। उस नकारा से मुराद वो शख्स है। जो किसी छोटे शख्स या मेरे जैसे लड़के के पोस्ट पर यकीन नहीं करते के ये पोस्ट उसने लिखा होगा। और मिस्त्री तो अब आप समझ ही गए होंगे। वही जो लंबी लंबी पोस्ट लिखने वाले हो। वो जो उसके जाने के बाद ईमारत बना लेता है। तो जब नकारा उसे देखता है। तो कहता हैं। ये उसने कही से बनी बनाई खरीदी होगी। उसका भी यही मतलब है। के आपने किसी भी मुद्दे पर कोई पोस्ट लिखा। पर वो यही कहेगा। ये पोस्ट कॉपी किया /चुराया है। आप कुछ भी कह दो। पर उसे यकीन दिलाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
अभी कुछ लोगो तो ये पोस्ट भी कॉपी किया हुआ लगेगा। खैर लगने दो हमें क्या। जिन्हें समझाना था वो समझ गऐ।
सबक। कभी किसी को छोटा बड़ा नहीं समझिये।
इल्म उम्र से नहीं। इल्म वालो के साथ उठने बैठने से हासिल होता है।
एक मिसाल।
एक 10 साल का बच्चा भी हाफ़िज़ ऐ क़ुरआन बन जाता है।
और एक 50 साल के इंसान से बिस्मिल्लाह भी सही से कहना नहीं आता।
उन सभी महाशयों को मद्दे नज़र रखते हुए। में एक शेर अर्ज़ कर रहा हु।
नासमझ की कोई दवा नहीं हकीमो के दवाखानो में।
वो बस हगना जानते है। मेंड़ और खेत खलियानों में।
हकीम दानिश की कलम से।
शोशल मिडिया का एक सच जिसमे बहुत से लोग ऐसे है हकीम दानिश की कलम से
आज का पोस्ट एक ऐसे मुद्दे पर है। जो अक्सर लोगो के सामने आता है। तो आइये सुनिये वो मुद्दा
क्या है। मुद्दा है। एक इंसान का दूसरे इंसान पे यक़ीन करना।
सबसे पहले एक कहानी सुनिए। आप वही पहुच जायेंगे जहा पहुचाना चाहता हु।
सुनिए एक गांव में एक राज मिस्त्री था। उसी गांव में एक और आदमी भी था। जो बिलकुल नकारा था। वो किसी की भी बात पे यकीन नही करता था। चाहे कोई कुछ भी कहे उसे यकीन नही आता था। वो बस दिन भर गांव में बैठा रहता था और सुबह शाम काम पर से आने वालो को देखकर। बेकार की बाते करता था। एक बार वो राज मिस्त्री उस नकारा आदमी को शहर ले गया। और उसे एक 20 मंज़िल की ईमारत दिखाई। उस के अंदर ले गया। कुछ सामान रह गया था वो लेने गया था वापसी में वो राज मिस्त्री ने कहा वो ईमारत कैसी लगी। उसने कहा बहुत अच्छी एक दम लाजवाब राज मिस्त्री बोला ये मैंने बनायीं है। पहले तो उस नकारा ने काफी देर उस मिस्त्री का मुह देखा फिर उस से बोला अबे अपनी शक्ल देखी है आईने में तू और इतनी खूबसूरत ईमारत बनाये। तेरे वस की नहीं है। ज्यादा लंबी लंबी न छोड़। मिस्त्री उसे जब भी शहर ले कर जाता और हर वार नयी नयी इमारते दिखाता और कहता ये मैने बनायीं है। ये मैंने बनाई है। पर उसे कभी यकीन न आया। तो फिर उस मिस्त्री ने कहा चल अबकी बार जब बनाऊंगा तो तू मेरे साथ रहना फिर देखना। उस ने कहा ठीक है। कुछ दिन बाद मिस्त्री को एक और ईमारत बनाने का काम मिला। अब मिस्त्री उस नकारा को साथ ले जाने लगा एक दो मंज़िल तैयार करने के बाद इस नकारा की तबियत खराब हो गयी जिस्की वजह से वो मिस्त्री के साथ नहीं आ सका पर मिस्त्री को तो काम करना ही था वी करता रहा और कुछ वक्त में ही उसने वो ईमारत तैयार कर दी। जब वो नकारा सही हुआ तो मिस्त्री उसे शहर ले कर आया। और वही ईमारत दिखाई जो इस बार उसने बनाई थी। और कहा ये देख तेरे जाने के बाद ये बनाई है। वो तो नकारा था। उसने फिर उसे झुठला दिया। के नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता।
तू और ऐसी ईमारत बनाये अबे जा अभी तू बच्चा है। जब में नहीं था हो सकता है। मेरे जाने के बाद इस ईमारत के मालिक ने कही से ये बनी बनाई खरीदी होगी। बहुत समझाया पर वो नहीं माना। आखिर कार उस मिस्त्री को यही कहना पढ़ा के हा भाई चल तू जीता में हारा ये उस मालिक ने कही से खरीदी है बस। उसने कहा हा देखा न अब आया लाइन पे।
।।।
यहाँ तक पहुचने के लिए शुक्रिया। अब इस पोस्ट के असल मुद्दे पर आता हु। इस पोस्ट का मकसद था। के वो हक़ीक़त दिखाना जो यहाँ शोशल साइट्स पर अक्सर लोग नहीं जानते और वो लोग पोस्ट लिखने वालो पे यकींन नहीं करते। उस नकारा से मुराद वो शख्स है। जो किसी छोटे शख्स या मेरे जैसे लड़के के पोस्ट पर यकीन नहीं करते के ये पोस्ट उसने लिखा होगा। और मिस्त्री तो अब आप समझ ही गए होंगे। वही जो लंबी लंबी पोस्ट लिखने वाले हो। वो जो उसके जाने के बाद ईमारत बना लेता है। तो जब नकारा उसे देखता है। तो कहता हैं। ये उसने कही से बनी बनाई खरीदी होगी। उसका भी यही मतलब है। के आपने किसी भी मुद्दे पर कोई पोस्ट लिखा। पर वो यही कहेगा। ये पोस्ट कॉपी किया /चुराया है। आप कुछ भी कह दो। पर उसे यकीन दिलाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।
अभी कुछ लोगो तो ये पोस्ट भी कॉपी किया हुआ लगेगा। खैर लगने दो हमें क्या। जिन्हें समझाना था वो समझ गऐ।
सबक। कभी किसी को छोटा बड़ा नहीं समझिये।
इल्म उम्र से नहीं। इल्म वालो के साथ उठने बैठने से हासिल होता है।
एक मिसाल।
एक 10 साल का बच्चा भी हाफ़िज़ ऐ क़ुरआन बन जाता है।
और एक 50 साल के इंसान से बिस्मिल्लाह भी सही से कहना नहीं आता।
उन सभी महाशयों को मद्दे नज़र रखते हुए। में एक शेर अर्ज़ कर रहा हु।
नासमझ की कोई दवा नहीं हकीमो के दवाखानो में।
वो बस हगना जानते है। मेंड़ और खेत खलियानों में।
हकीम दानिश की कलम से।
Tuesday, July 21, 2015
दरभंगा की मस्जिद का सच
Darbhanga.. दरभंगा ."झगड़ौवा मस्जिद" का सच.... मोहम्मद शाकेव भाई की वाल से
इस मस्जिद का नाम "झगड़ौवा मस्जिद" है..दरअसल जब दरभंगा के राजा "महाराजा कामेशवर सिंह" दरभंगा किला बनवा रहे थे तो ये मस्जिद किले की दिवार के रास्ते में आगया..
महाराज ने इस मस्जिद को जस का तस रखा और किले की दिवार को |___| कुछ ऐसा ही U आकर में मोड़ने का हुक्म दिया.....
जहाँ महाराज की इस महानता का गुणगान किया जाना चाहिए था वहां "समाज के भाई चारे को तोड़ने वालों" ने इस कहानी को उलट दिया और हमें बताया गया के मुस्लिम और महाराज में झगड़ा हुआ और मजबूरन महाराज ने किले की दिवार का रास्ता बदला.... इसी वजह कर मस्जिद का नाम झगड़ौवा मस्जिद पडा....
इस मस्जिद के नाम का सच आज हमें Kumud Singh से कुछ इस तरह पता चला....
....दरअसल यह एक साजिश है जो दरभंगा को बदनाम करनेवाले लोगों की करतूत है। दरअसल किले को लेकर महाराजा और अग्रवाल परिवार में झगडा हुआ था। मामला अदालत तक पहुंचा और महाराज मुकदमा हार गये, किले का निर्माण अग्रवाल के मकान के आगे नहीं हो सका।भाईचारा तोड़ने वालों ने इस पूरे मामले को इस मस्जिद की कहानी बना डाला, जबकि इस मस्जिद के साथ कोई झगडा हुआ ही नहीं। पहले महाराजा को मुसलिमों की नजर में गिराने फिर हिंदू और मुसलमान को लडाने के लिए जगन्नाथी लोगों ने इसे झगडूआ मस्जिद के नाम से पुकारने लगे। राज दरभंगा के कई परिसरों में मजार मौजूद हैं। जीएम रोड, डेनबी रोड और टावर पर तो बीच सडक पर मजार है। किले के निर्माण में यह मस्जिद कभी झगडे का कारण नहीं बना। किसी के पास दस्तावेज है तो सामने लाये...।
...वैसे तो मै share करने की भीख नहीं करता पर सच को सामने लाने के लिए आप से निवेदन कर रहा हूँ के इसे ज़्यादा से ज़्यादा share करें....
जब उस्मान अली खान ने सरकार को 5 टन सोना दिया दान में

जब उस्मान अली ख़ान ने सरकार को 5 टन सोने की इमदाद दी.......
1965 पाकिस्तान विजय के बाद भारत के लिए सबसे बड़ा ख़तरा ताक़तवर पड़ोसी चीन से था...उन हालात में भविष्य में उत्पन होने वाले ख़तरे से निपटने के लिए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने National Defence Fund का गठन किया..और Government of India ने राजाओं से सहयोग की अपील की मगर...........
इस मुश्किल वक़्त में कोई आगे नहीं आया.. …..और सब कुछ उम्मीद के ख़िलाफ़ हुआ………………
फिर प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हैदराबाद का रुख़ किया; वह जानते थे कि Nizam Mir Osman Ali Khan भारतीय सरकार को कभी मायूस न करेंगे...प्रधानमंत्री हैदराबाद गये और निज़ाम से आग्रह किया कि वह खुले दिल से National Defence Fund में योगदान करें……
बग़ैर हिचकिचाए Nizam Mir Osman Ali Khan ने एलान किया कि वह 5 टन सोने से National Defence Fund को इमदाद करेंगे.........
Nizam के इस ऐलान ने वहाँ मौजूद तमाम लोगों को हैरत में डाल दिया....
लेकिन ASIF JAH VII ने भारतीय इतिहास में सबसे बड़ा चंदा देकर एक ऐसा रिकोर्ड बनाया कि जिसे कोई संस्था या व्यक्ति आज तक तोड़ नहीं पाया.....
उनके द्वारा चंदे के तौर पर दिए गए सोने की क़ीमत रु. 1500-1600 करोड़ है.......
मुकेश अंबानी , टाटा , बिडला और अडाणी उसके जैसे रईसों में अगर मुल्कपरस्ती का माद्दा है तो ऐसा कोई कारनामा कर के दिखाएं कि आज से 50 साल के बाद मुझ जैसा कोई इनकी हुब्बुल वतनी के क़िस्से लिख रहा हो...
हकीम दानिश
सच से वाकिफ
Sunday, July 19, 2015
हमें इंसाफ चाहिए
ये है सरदार सूरत सिंह जी खालसा...
में भी आपकी तरह इनको नही जानता था
जान अब्दुल्लाह भाई ने इनका फोटो अपने प्रोफाइल पे लगाया
आपकी तरह मेरे मन में भी सवाल आया को आखिर है कौन ये महाशय..?
सो पूछ लिया अब्दुल्लाह जान भाई से ,
पर इनके बारे में जानते ही में दंग रह क्या । वो क्यों तो जानिये आप भी
मेने पूछा - की यह इतने कमज़ोर क्यों दिख रहे है
अब्दुल्लाह जान - ये 186 दिन से भूख हड़ताल पर है
अपने गाँव हसनपुर पंजाब में...
जान अब्दुल्लाह - इनकी मांग है की सिखों को जेल से रिहा किया जाये
तो में बोल भाई कानून नाम की भी कोई चीज़ होती है ऐसे केसे किसी को भी रिहा कर दे सजा पूरी होने के बाद ही रिहा करेगी सरकार..
इसके बाद जब पता चला की बाबाजी उन लोगो की ही रिहाई की मांग कर रहे है जिनकी सजा पूरी हो चुकी है..
तब जा के माथा ठनका....
जिसकी सजा पूरी हो गयी है उन्हें भी जेल में बंद कर रखा है
ये तो सरासर गलत है
फिर सोचा मीडिया तो आवाज़ उठा रही होगी सरकार ध्यान नही दे रही....
पर पता चला को 6 महीने में एक बार मीडिया ने इसे कवरेज नही दी...
जात-पात से ऊपर उठ कर इन्साफ के लिए आवाज़ उठानी पड़ेगी...
सरकार अल्पसंख्यको के साथ शुरू से ऐसा हो दोगलापन करती आ रही..
84 दंगा हुआ सिख बोले मुस्लिम चुप रहे...
1992 ,2002 हुआ मुस्लिम बोले सिख चुप रहे....
आज फिर सिख की बारी है आज भी हम चुप रहे तो अगली बार ये फिर हमारी नंबर पर चुप रहेंगे...
अकेले चिल्लाने से कुछ नही होगा
मिल कर आवाज़ उठाओ और अपना हक लो...
वेसे ही पोस्ट बहुत लम्बी हो चुकी है इसलिए ख़त्म करता हु
हकीम दानिश
हमें इंसाफ चाहिए
یہ جو تصویر میں دکھائی دے رہے ہے نا
یہ ہے سردار صورت سنگھ جی خالصہ ...
میں بھی آپ کی طرح ان کو نہیں جانتا تھا
جان عبداللہ بھائی نے ان کا تصویر اپنے پروفائل پہ لگایا
آپ کی طرح میرے ذہن میں بھی سوال آیا کو آخر ہے کون یہ حضرت ..؟
سو پوچھ لیا عبداللہ جان بھائی سے،
پر ان کے بارے میں جانتے ہی میں دنگ رہ کیا. وہ کیوں تو جانيے آپ بھی
مینے پوچھا - کی یہ اتنے کمزور کیوں دکھائی دے رہے ہے
عبداللہ جان - یہ 186 دن سے بھوک ہڑتال پر ہے
اپنے گاؤں حسن پور پنجاب میں ...
میں - کیوں بھائی ایسا کیا ہو گیا جو یہ 6 ماہ سے بھوک ہڑتال پر ہے
جان عبداللہ - ان کا مطالبہ ہے کی سکھوں کو جیل سے رہا کیا جائے
تو میں بول بھائی قانون نام کی بھی کوئی چیز ہوتی ہے ایسے کیسے کسی کو بھی رہا کر دے سزا پوری ہونے کے بعد ہی رہا کرے گی حکومت ..
اس کے بعد جب پتہ چلا کی باباجي ان لوگو کی ہی رہائی کا مطالبہ کر رہے ہیں جن کی سزا مکمل ہو چکی ہے ..
تب جا کے ماتھا ٹھنکا ....
جس کی سزا پوری ہو گئی ہے انہیں بھی جیل میں بند کر رکھا ہے
یہ تو سراسر غلط ہے
پھر سوچا میڈیا تو آواز اٹھا رہی ہوگی حکومت توجہ نہیں دے رہی ....
پر پتہ چلا کو 6 ماہ میں ایک بار میڈیا نے اسے کوریج نہیں دی ...
تب سوچا اب خود ہی اس کی آواز اٹھانی پڑے گی ...
ذات پات سے اوپر اٹھ کر انصاف کے لئے آواز اٹھانی پڑے گی ...
حکومت الپسكھيكو کے ساتھ شروع سے ایسا ہو دوگلاپن کرتی آ رہی ..
84 فساد ہوا سکھ بولے مسلم خاموش رہے ...
1992، 2002 ہوا مسلم بولے سکھ خاموش رہے ....
آج پھر سکھ کی باری ہے آج بھی ہم چپ رہے تو اگلی بار یہ پھر ہماری نمبر پر خاموش رہیں گے ...
اکیلے چلانے سے کچھ نہیں ہوگا
مل کر آواز اٹھاو اور اپنا حق لو ...
وےسے ہی پوسٹ بہت لمبی ہو چکی ہے لہذا ختم کرتا ہ






